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प्रेम मन्दिर
प्रेम मन्दिर
Prem mandir Vrindavan.JPG
प्रेम मन्दिर का बाहरी दॄश्य
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धता सनातन हिन्दू धर्म
अवस्थिति जानकारी
अवस्थिति वृंदावन
ज़िला मथुरा
राज्य उत्तर प्रदेश
देश भारत
भौगोलिक निर्देशांक 27.571°N 77.671°Eनिर्देशांक: 27.571°N 77.671°E
वास्तु विवरण
प्रकार हिन्दू स्थापत्य शैली
निर्माता जगद्गुरु कृपालु जी महाराज
अवस्थिति ऊँचाई 169.77 मी॰ (557 फीट)
प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है।[2] प्रेम मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। इसमें इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है और इसे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया है। इस मन्दिर का शिलान्यास १४ जनवरी २००१ को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था।[3] ग्यारह वर्ष के बाद तैयार हुआ यह भव्य प्रेम मन्दिर सफेद इटालियन करारा संगमरमर से तराशा गया है।[2] मन्दिर दिल्ली – आगरा – कोलकाता के राष्ट्रीय राजमार्ग २ पर छटीकरा से लगभग ३ किलोमीटर दूर वृंदावन की ओर भक्तिवेदान्त स्वामी मार्ग पर स्थित है। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला के पुनर्जागरण का एक नमूना है।
प्रेम मन्दिर
प्रेम मन्दिर
Prem mandir Vrindavan.JPG
प्रेम मन्दिर का बाहरी दॄश्य
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धता सनातन हिन्दू धर्म
अवस्थिति जानकारी
अवस्थिति वृंदावन
ज़िला मथुरा
राज्य उत्तर प्रदेश
देश भारत
भौगोलिक निर्देशांक 27.571°N 77.671°Eनिर्देशांक: 27.571°N 77.671°E
वास्तु विवरण
प्रकार हिन्दू स्थापत्य शैली
निर्माता जगद्गुरु कृपालु जी महाराज
अवस्थिति ऊँचाई 169.77 मी॰ (557 फीट)
प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है।[2] प्रेम मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। इसमें इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है और इसे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया है। इस मन्दिर का शिलान्यास १४ जनवरी २००१ को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था।[3] ग्यारह वर्ष के बाद तैयार हुआ यह भव्य प्रेम मन्दिर सफेद इटालियन करारा संगमरमर से तराशा गया है।[2] मन्दिर दिल्ली – आगरा – कोलकाता के राष्ट्रीय राजमार्ग २ पर छटीकरा से लगभग ३ किलोमीटर दूर वृंदावन की ओर भक्तिवेदान्त स्वामी मार्ग पर स्थित है। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला के पुनर्जागरण का एक नमूना है।
प्रेम मन्दिर
प्रेम मन्दिर
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प्रेम मन्दिर का बाहरी दॄश्य
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धता सनातन हिन्दू धर्म
अवस्थिति जानकारी
अवस्थिति वृंदावन
ज़िला मथुरा
राज्य उत्तर प्रदेश
देश भारत
भौगोलिक निर्देशांक 27.571°N 77.671°Eनिर्देशांक: 27.571°N 77.671°E
वास्तु विवरण
प्रकार हिन्दू स्थापत्य शैली
निर्माता जगद्गुरु कृपालु जी महाराज
अवस्थिति ऊँचाई 169.77 मी॰ (557 फीट)
प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है।[2] प्रेम मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। इसमें इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है और इसे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया है। इस मन्दिर का शिलान्यास १४ जनवरी २००१ को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था।[3] ग्यारह वर्ष के बाद तैयार हुआ यह भव्य प्रेम मन्दिर सफेद इटालियन करारा संगमरमर से तराशा गया है।[2] मन्दिर दिल्ली – आगरा – कोलकाता के राष्ट्रीय राजमार्ग २ पर छटीकरा से लगभग ३ किलोमीटर दूर वृंदावन की ओर भक्तिवेदान्त स्वामी मार्ग पर स्थित है। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला के पुनर्जागरण का एक नमूना है।
प्रेम मन्दिर
प्रेम मन्दिर
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प्रेम मन्दिर का बाहरी दॄश्य
धर्म संबंधी जानकारी
सम्बद्धता सनातन हिन्दू धर्म
अवस्थिति जानकारी
अवस्थिति वृंदावन
ज़िला मथुरा
राज्य उत्तर प्रदेश
देश भारत
भौगोलिक निर्देशांक 27.571°N 77.671°Eनिर्देशांक: 27.571°N 77.671°E
वास्तु विवरण
प्रकार हिन्दू स्थापत्य शैली
निर्माता जगद्गुरु कृपालु जी महाराज
अवस्थिति ऊँचाई 169.77 मी॰ (557 फीट)
प्रेम मंदिर भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के मथुरा जिले के समीप वृंदावन में स्थित है। इसका निर्माण जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा भगवान कृष्ण और राधा के मन्दिर के रूप में करवाया गया है।[2] प्रेम मन्दिर का लोकार्पण १७ फरवरी को किया गया था। इस मन्दिर के निर्माण में ११ वर्ष का समय और लगभग १०० करोड़ रुपए की धन राशि लगी है। इसमें इटैलियन करारा संगमरमर का प्रयोग किया गया है और इसे राजस्थान और उत्तरप्रदेश के एक हजार शिल्पकारों ने तैयार किया है। इस मन्दिर का शिलान्यास १४ जनवरी २००१ को कृपालुजी महाराज द्वारा किया गया था।[3] ग्यारह वर्ष के बाद तैयार हुआ यह भव्य प्रेम मन्दिर सफेद इटालियन करारा संगमरमर से तराशा गया है।[2] मन्दिर दिल्ली – आगरा – कोलकाता के राष्ट्रीय राजमार्ग २ पर छटीकरा से लगभग ३ किलोमीटर दूर वृंदावन की ओर भक्तिवेदान्त स्वामी मार्ग पर स्थित है। यह मन्दिर प्राचीन भारतीय शिल्पकला के पुनर्जागरण का एक नमूना है।



मायण चौपाई सुंदरकांड अर्थ सहित
जासु नाम जपि सुनहु भवानी।
भव बंधन काटहिं नर ग्यानी॥
तासु दूत कि बंध तरु आवा।
प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा॥
अर्थ : (शिवजी कहते हैं) हे भवानी सुनो – जिनका नाम जपकर ज्ञानी मनुष्य संसार रूपी जन्म-मरण के बंधन को काट डालते हैं, क्या उनका दूत किसी बंधन में बंध सकता है? लेकिन प्रभु के कार्य के लिए हनुमान जी ने स्वयं को शत्रु के हाथ से बंधवा लिया।
रामायण चौपाई लिरिक्स अर्थ सहित
एहि महँ रघुपति नाम उदारा।
अति पावन पुरान श्रुति सारा॥
मंगल भवन अमंगल हारी।
उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥
अर्थ : रामचरितमानस में श्री रघुनाथजी का उदार नाम है, जो अत्यन्त पवित्र है, वेद-पुराणों का सार है, मंगल (कल्याण) करने वाला और अमंगल को हरने वाला है, जिसे पार्वती जी सहित स्वयं भगवान शिव सदा जपा करते हैं।
रामायण की चौपाई अर्थ सहित
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा।
गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥
अर्थ : जो कुछ राम ने रच रखा है, वही होगा। तर्क करके कौन शाखा (विस्तार) बढ़ावे। अर्थात इस विषय में तर्क करने से कोई लाभ नहीं। (मन में) ऐसा कहकर भगवान शिव हरि का नाम जपने लगे और सती वहाँ गईं जहाँ सुख के धाम प्रभु राम थे।
रामायण की सर्वश्रेष्ठ चौपाई | रामायण की चौपाई | रामायण चौपाई | Ramayan Chaupai | सम्पूर्ण रामायण
हरि अनंत हरि कथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
जा पर कृपा राम की होई।
ता पर कृपा करहिं सब कोई॥
जिनके कपट, दम्भ नहिं माया।
तिनके ह्रदय बसहु रघुराया॥
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
बिनु सत्संग विवेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
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