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अक्सर हम कपड़ों को संभालने के लिए सेफ्टी पिन का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके नीचे बना वह छोटा सा गोल छेद (hole) किस काम आता है? यह सिर्फ कोई डिज़ाइन नहीं, बल्कि पिन का सबसे अहम हिस्सा है जो इसे सुरक्षित बनाता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह गोलाकार हिस्सा असल में एक 'स्प्रिंग' (spring) की तरह काम करता है। इसे 1849 में वॉल्टर हंट ने तार को मोड़कर तैयार किया था। यह स्प्रिंग पिन पर पीछे से दबाव बनाता है, जिससे पिन की नोक लॉक में मजबूती से फंसी रहती है। अगर यह गोल लूप न हो, तो पिन पर जरूरी दबाव नहीं बनेगा और वह बार-बार खुलकर गिर सकती है या आपको चोट पहुंचा सकती है।
इसके अलावा, यह गोलाकार हिस्सा पिन को लचीला बनाता है, जिससे इसे बार-बार खोलने और बंद करने पर भी यह जल्दी टूटती नहीं है। एक अन्य दावे के अनुसार, यदि गलती से कोई बच्चा पिन निगल ले, तो इस छेद से हवा पास होने की संभावना रहती है, जो जान बचाने में मददगार हो सकती है।
10 फरवरी 1985 को महाराष्ट्र के नागपुर में एक बच्चे का जन्म हुआ। जन्म के महज तीन दिन बाद ही उसकी मां ने उसे छोड़ दिया। 1 महीने तक वो बच्चा अनाथ आश्रम में रहा और फिर मुंबई घूमने आए डच कपल ने बच्चे को गोद ले लिया। वो उसे अपने साथ नीदरलैंड ले गए।
इस घटना को 41 साल हो गए हैं। नीदरलैंड में बच्चे की परवरिश हुई और आज वो नीदरलैंड के एक शहर का मेयर बन चुका है। उनका नाम है फाल्गुन बिनेनडिज्क, जो 41 साल की उम्र में अपनी मां को ढूंढने के लिए भारत आए हैं।
आधिकारिक रिकॉर्ड्स के अनुसार, फाल्गुन की मां 21 वर्षीय अविवाहित युवती थी, जिसमें समाज के डर से अपने बच्चे को तीन दिन बाद की नागपुर के MSS में छोड़ दिया था। ये जगह अनाथ बच्चों और पीड़ित महिलाओं के लिए है।
MSS की एक नर्स ने बच्चे को नाम दिया था। दरअसल हिंदू कैलेंडर के अनुसार, फरवरी के महीने को फाल्गुन कहा जाता है। बच्चे का जन्म भी फरवरी में हुआ था, जिसके कारण नर्स ने उन्हें फाल्गुन कहना शुरू कर दिया। कुछ हफ्तों बाद फाल्गुन को मुंबई लाया गया, जहां 1 डच कपल ने उन्हें गोद ले लिया।
फाल्गुन नीदरलैंड में ही पले-बढ़े। उन्हें भारत के बारे में कुछ पता नहीं था। उन्होंने सिर्फ भूगोल की किताबों में बने नक्शे में भारत का मानचित्र देखा था। बढ़ती उम्र के साथ फाल्गुन के मन में अपनी असली मां के बारे में जानने की ललक जगी और उन्होंने भारत का रुख कर लिया।
फाल्गुन पहली बार 18 साल की उम्र में 2006 में भारत आए थे। इस दौरान उन्होंने दक्षिण भारत की सैर की थी। मगर, इस बार फाल्गुन ने अलग मकसद से वापसी की है। उन्होंने नागपुर स्थित MSS का दौरा किया।
फाल्गुन के अनुसार मैं हमेशा से एक खुली किताब था। मैंने महाभारत पढ़ी है और मुझे लगता है कि हर कर्ण को कुंती से मिलने का अधिकार है।
बता दें कि फाल्गुन हीमस्टेड शहर के मेयर हैं। हीमस्टेड नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम से महज 30 किलोमीटर की दूरी पर है। फाल्गुन ने अपनी मां को ढूंढने के लिए कई NGO, नगर पालिकाओं और पुलिस की मदद मांगी है। फाल्गुन का कहना है, "मुझे लगता है कि वो अभी तक मुझे छोड़ने के सदमे में होंगी। मैं सिर्फ उनसे मिलकर उन्हें बताना चाहता हूं कि मैं ठीक हूं और खुश हूं। मैं उन्हें एक बार देखना चाहता हूं।"
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सूरत में मकर संक्रांति के त्यौहार के दिन 70 फिट ऊंचे फ्लाईओवर से गुजर रहा परिवार अचानक कातिल मांझे की चपेट में आ गया।
इससे मोटर साइकिल का संतुलन बिगड़ गया और परिवार फ्लाईओवर से नीचे जा गिरा।
हादसे में 7 साल की बेटी और 35 साल के पिता की मौके पर ही मौत हो गई।
जबकि मां की मौत अस्पताल में हुई. सूरत को वेड रोड और अड़ाजन को जोड़ने वाला चंद्रशेखर आजाद फ्लाई ओवर ब्रिज (जिलानी ब्रिज से प्रख्यात) पर एक ऐसा हादसा हुआ कि रूह कांप जाए।
मकर संक्रांति की छुट्टी के दिन रेहान अपनी पत्नी और बेटी को लेकर घूमने निकला था।
फूल स्पीड में चंद्रशेखर आजाद ब्रिज से गुजर रहा था, तभी अचानक पतंग का मांझा उसके शरीर पर आ जाता है।
एक हाथ से मांझा हटाने की कोशिश में गाड़ी का संतुलन बिगड़ जाता है और जोर से गाड़ी ब्रिज की दीवार से टकराती है।
इस दौरान मोटर साइकिल के पीछे बैठी पत्नी और बेटी के साथ रेहान नीचे गिरते हैं।
पत्नी रेहाना ओर बेटी अलीशा के साथ वह 70 फिट नीचे गिरते हैं।
इस दौरान रेहान और उनकी बेटी अलीशा की मौके पर ही मौत हो जाती है, जबकि रेहाना की मौत अस्पताल में हुई।
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