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इस तस्वीर को शब्द रूप देने की छोटी सी कोशिश-
सावन में सावन आया,
मन का मनभावन आया।
जलती तपती धरा को,
बूँदों से मनावन आया।
जूतों की सख़्त सतह पर,
प्रीत के कोमल पाँव।
जैसे आई अरसे से,
दिल की देहरी पर छाँव।
रुठी-रुठी मोहब्बत को
सरहद से रिझावन आया।
सावन में सावन आया,
मन का मनभावन आया।
संगीनों के साये से,
सजनी का साया पाकर।
इज़हार इश्क़ का करता,
वो उसको उँचा उठा कर।
एक फ़र्ज़ से माँग इजाज़त,
दूजा निभावन आया।
सावन में सावन आया,
मन का मनभावन आया।
साड़ी की हरी बेल पर,
कोई कोंपल नई हो आई।
आँचल ऐसे मुस्काये,
जैसे चलती हो पुरवाई।
कब से सूने माथे पर,
आलिंगन पावन आया।
सावन में सावन आया,
मन का मनभावन आया।
पहली बार मिला मैं मौन से,
दिल के भीतर रहता था।
मेरी तर्कहीन चीख़ों से-
छुपकर डरकर रहता था।
मैंने कहा खुलकर के बोलो,
आज मिले हो जो मुझसे,
रख दो सारे सामने मेरे-
शिकवे गिले हो जो मुझसे।
उसकी बातों ने बतलाया-
मुझको ये एहसास कराया,
भीड़ की बस्ती की सरहद पर
वो कैसे बेघर रहता था।
पहली बार मिला मैं मौन से,
दिल के भीतर रहता था।
बुद्ध की मुस्कान है मुझमें,
जो मुझको स्वीकारो तो,
मैं हिमालय सा सुकून
जो आकर डेरा डारो तो।
मैं मकरन्द के मंदर सा,
मुझमें दो पल गुज़ारो तो।
सोचा ऐसा कह दे मुझको-
पर मन मसोसकर रहता था।
पहली बार मिला मैं मौन से,
दिल के भीतर रहता था।
शोर भरी उलझनों के
रस्तों में शजर की छाँव सा हूँ,
मैं गोधूली पगड़ी बाँधे हुए-
तेरे बाबा के गाँव सा हूँ।
मेरी इस मुलाक़ात से पहले-
आज हुई इस बात से पहले,
वो धरती के एक छोर सा-
मुझसे कटकर रहता था।
पहली बार मिला मैं मौन से,
दिल के भीतर रहता था।
रिश्तों का संतुलित अनुपात निकाल देते थे।
प्यार से नफ़रत की औक़ात निकाल देते थे।।
जिस तरह निकाल देते हैं दालों से पत्थर-
पुराने लोग बिगड़ी हुई बात निकाल देते थे।
इंसानियत मोहताज नही थी सुविधा की-
गर्मी में गत्ते की हवा से रात निकाल देते थे।
पहचान कर चोट जिस्म की है या रूह की-
मिलकर मुश्किल हालात निकाल देते थे।
इकट्ठे हो के मोहल्ले में बिन किसी मुहूर्त के-
बच्चे गुड्डे-गुड़ियों की बारात निकाल देते थे।
घुटते नही थे मन ही मन किसी बात को ले-
साथियों के बीच सारे जज़्बात निकाल देते थे।
उड़ जाते थे शामियाने जब किसी ग़रीब के-
सब लोग मदद की कनात निकाल देते थे।
अब ख़ुशियाँ नही बाँटी जाती बस्तियों में-
पहले ख़ुशियों की सौग़ात निकाल देते थे।
वो वक़्त था सिनेमा के किरदारों का ‘शेखर’-
छोटे से संवाद में पूरे ख्यालात निकाल देते थे।
ज़िंदगी ने तारीख़ दी-
दिल को हाज़िर करने की।
कहती है इसे अदा समझो-
जीने में माहिर करने की।
उसको जिद है अपने जादू से-
मुझको साहिर करने की।
मैंने कहा मैं आदमी अदब का-
बात क्यूँ शातिर करने की।
फिर रूठ गई ये कहकर वो-
बात न कभी फिर करने की।
ठुकरा के उसकी चालें-
इन होठों को स्थिर करने की।
मैंने चुकाई है अक्सर क़ीमत-
नाराज़गी ज़ाहिर करने की।