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कहते हैं कि बचपन खेलने, सपने देखने और सीखने का समय होता है। लेकिन ज़िंदगी हर किसी को एक जैसी नहीं मिलती। महज़ 8 से 10 साल की एक बच्ची, सड़क के किनारे गाना गाकर और डोल बजाकर राहगीरों को खुश करती है और बदले में कुछ रुपये मिल जाते हैं। यही उसके परिवार की रोज़मर्रा की कमाई है।
जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उस उम्र में इस बच्ची के हाथों में वाद्ययंत्र और ज़िम्मेदारियों का बोझ है। और इससे भी ज़्यादा भावुक करने वाला दृश्य यह है कि उसके साथ उसका छोटा भाई लेटा रहता है, जिसे वह बार-बार गुदगुदाकर हंसाने की कोशिश करती है—कहीं वह रोने न लगे, कहीं उसे कोई चोट न पहुंच जाए।
लोग कहते हैं कि बड़ा भाई या बड़ी बहन कभी-कभी मां-बाप से भी बढ़कर होते हैं, और यह दृश्य उसी बात की जीवंत मिसाल बनकर सामने आता है।
ये पल सिर्फ़ गरीबी की तस्वीर नहीं, बल्कि मजबूरी और ज़िम्मेदारी का बोझ उठाते बचपन की चीख भी है।
कभी-कभी मन में सवाल उठता है—
भगवान सबके लिए व्यवस्था करता है, पर इन बच्चों के लिए क्यों नहीं?
क्यों उनकी खुशियाँ, उनका बचपन और उनके सपने अक्सर भूख और हालात के आगे हार जाते हैं?
सच्चाई यह है कि समाज में ऐसे हज़ारों परिवार हैं, जिनके लिए पेट की आग बुझाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बन जाता है। शिक्षा, खेल, सपने—सब पीछे रह जाते हैं।
इस बच्ची की कहानी सिर्फ़ दया या भावनाओं की नहीं, बल्कि उस सिस्टम की भी है जिसने बचपन को आर्थिक बोझ बना दिया।