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गुजरात के साधुलभाई चावडा ने अपनी प्रतिभा से ऑटोमोबाइल जगत को चौंका दिया है। पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच उन्होंने स्कूटी के पुराने टायर और लोहे के कबाड़ का इस्तेमाल कर एक सोलर कार तैयार की है। मात्र 30,000 रुपये की लागत में बनी यह कार पूरी तरह सूरज की रोशनी से चार्ज होती है और एक बार फुल चार्ज होने पर 50 से 60 किलोमीटर का सफर फुर्ती से तय करती है। साधुलभाई ने घर पर ही वेल्डिंग करके इसकी बॉडी तैयार की है और छत पर 100 वाट के सोलर पैनल लगाए हैं। 40 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली इस कार में तीन लोग बैठ सकते हैं और इसमें म्यूजिक सिस्टम के साथ छोटा पंखा भी लगा है। यह देसी आविष्कार साबित करता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद इच्छाशक्ति से बदलाव लाया जा सकता है।
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रोटी छिपाकर बाथरूम में खाना पड़ता
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फ़र्श से अर्श तक: सविता प्रधान की वो दर्दनाक कहानी जो खून जमा देगी!
महज 16 साल की उम्र में शादी हो गई सविता प्रधान की।
एक गरीब आदिवासी परिवार की बेटी, जो सपने देखती थी, लेकिन जिंदगी ने उसे नर्क का टिकट थमा दिया।
शादी के बाद ससुराल बन गई जलती हुई आग।
पति के सामने सबके सामने गालियां, थप्पड़, लातें और बेइज्जती रोज का हिस्सा बन गई।
घर की सफाई, बर्तन, कपड़े धोना — सब कुछ नौकरानी की तरह।
खाना? वो भी मुश्किल।
सविता खुद बताती हैं — “मैं कई बार अपनी अंडरगारमेंट्स में रोटी छिपाकर बाथरूम जाती थी और वहाँ चुपके से सिर्फ रोटी खाकर पेट भरती थी।”
शोषण की आग रोज भड़कती गई।
छोटी-छोटी बातों पर पीटना आम हो गया।
माथा फट गया, हाथों पर चाकू के निशान, पीठ पर जलने के घाव —
शरीर पर हर जख्म उनकी कहानी चीख-चीखकर बयान करता था।
एक दिन पिता आए।
सविता रो-रोकर बोली — “मुझे घर ले चलो।”
पिता ने वादा किया — “शाम तक आऊंगा और ले जाऊंगा।”
लेकिन शाम हुई, रात हुई... पिता नहीं आए।
उस दिन सविता को एहसास हो गया — इस नरक से उसे बचाने कोई नहीं आने वाला।“
मैं फांसी लगाने ही वाली थी...
”दो बच्चों की मां बन चुकी थीं सविता।
फिर भी अत्याचार थमने का नाम नहीं ले रहा था।
एक दिन हिम्मत टूट गई।
बच्चों को सुलाया, छोटे बेटे को दूध पिलाया, माथा चूमा — जैसे आखिरी बार।
स्टूल खींचा, पंखे पर साड़ी बांधी और फांसी लगाने को तैयार हो गईं।
ठीक उसी पल खिड़की से सास का चेहरा दिखा।
सास ने उन्हें देखा... लेकिन न रोका, न कुछ बोला।
चेहरा बिल्कुल भावहीन।
वे चुपचाप चली गईं, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उस पल सविता के अंदर कुछ टूटा और कुछ जागा।
वे बोलीं — “मैं इन लोगों के लिए अपनी जान नहीं दे सकती।”
फांसी का फंदा उतारा, हिम्मत बटोरी और ससुराल से भाग निकलीं।
बाल्टी भर पेशाब फेंक दिया... बच्चों के सामने!
ससुराल छोड़कर चचेरी बहन की भाभी के घर शरण ली।
केवल 2700 रुपये और दो बच्चे साथ लेकर शुरू हुई नई जिंदगी।
दिन में पार्लर में काम, शाम को ट्यूशन, रात को पढ़ाई।
भूख, थकान, ताने — सब सहा।
लेकिन पति का साया अभी भी पीछा नहीं छोड़ रहा था।
वो अचानक आता, बच्चों के सामने मारपीट करता।
एक दिन तो बेहद शर्मनाक घटना हुई —
एग्जाम देने जा रही थीं सविता।
पति ने बाल्टी में पेशाब किया और उनके ऊपर फेंक दिया!
बच्चों के सामने पूरा अपमान।सविता ने रोया नहीं।
फिर से नहाया, कपड़े बदले और सीधे एग्जाम हॉल पहुंच गईं।
उनका दिल अब पत्थर बन चुका था।
पहले अटेम्प्ट में ही MP PCS क्रैक, फिर UPSC में IAS!
अकेले बच्चों की परवरिश करते हुए सविता ने पढ़ाई नहीं छोड़ी।
पहले प्रयास में ही मध्य प्रदेश राज्य सिविल सेवा परीक्षा (PCS) पास कर ली।
आदिवासी छात्रा होने के नाते सरकार ने उन्हें तीनों चरण पास करने पर 75,000 रुपये की छात्रवृत्ति दी।
फिर 2017 में UPSC का फॉर्म भरा।
पहले ही अटेम्प्ट में प्रीलिम्स, मेन्स और इंटरव्यू क्लियर करके IAS अधिकारी बन गईं।
आज सविता प्रधान एक शक्तिशाली IAS अधिकारी हैं।
वे अपने पद का इस्तेमाल गरीब, खासकर आदिवासी और दलित महिलाओं-लड़कियों की मदद के लिए करती हैं।
उनका संदेश साफ है —
“कोई भी लड़की चुपचाप सहन न करे। शिक्षा और हिम्मत से हर नर्क से निकला जा सकता है।”
यह कहानी सिर्फ सफलता की नहीं, जिंदा रहने की, लड़ने की और जीतने की है।
सविता प्रधान ने साबित कर दिया —
फ़र्श से अर्श तक का सफर दर्द, अपमान और मौत के मुंह से गुजरकर भी तय किया जा सकता है।
एक सच्ची योद्धा। एक असली प्रेरणा।
सविता प्रधान — सलाम है आपको!
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