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पहले पैसा कमा लूँ, फिर भजन करूँगा।
Bhajan Marg by Param Pujya Vrindavan Rasik Sant Shri Hit Premanand Govind Sharan Ji Maharaj, Shri Hit Radha Keli Kunj, Varah Ghat, Vrindavan Dham
#premanandjimaharaj #vrindavan

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बेंगलुरु में एक महिला मॉर्निंग वॉक के लिए घर से निकली, इस बीच पड़ोसी के कुत्ते ने उस पर हमला कर दिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
यह घटना 26 जनवरी को सुबह लगभग 6:54 बजे की है, जब एचएसआर लेआउट की टीचर्स कॉलोनी में महिला सुबह की सैर पर निकली थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुत्ते ने बिना किसी उकसावे के हमला किया और महिला की गर्दन पर काट लिया। जब एक आदमी उसे बचाने के लिए दौड़ा तो कुत्ते ने उस पर भी हमला कर दिया।
फुटेज में दिख रहा है कि आदमी कुत्ते को गर्दन से पकड़कर पीड़ित से दूर खींच रहा है। जब आदमी जानवर से जूझ रहा था तो महिला किसी तरह उठकर घर के अंदर चली गई और अपने पीछे गेट बंद कर लिया।
पीड़िता के चेहरे, हाथों और पैरों में चोटें आई हैं और फिलहाल उसका अस्पताल में इलाज चल रहा है। महिला के पति ने एचएसआर लेआउट पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें उन्होंने कुत्ते के मालिक पर लापरवाही का आरोप लगाया है।
#dogattack #bengaluru

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एक सर्वे के मुताबिक 87% जनता मोदी को लात मारके सत्ता से हटाना चाहती है...?

कितने लोग इस बात से सहमत है?

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राधे राधे का स्मरण करते रहो 💯🥺💖
#lifestyle #inspiration #suvichar #krishnaquotes #motivational #motivation #brijtalks #viral #viralpost #trending

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उत्तराखंड के रहने वाले मशहूर यूट्यूबर सौरव जोशी (Sourav Joshi) आज करोड़ों की कमाई कर रहे हैं, लेकिन उनका शुरुआती सफर बेहद संघर्षपूर्ण रहा । एक समय था जब उनके पिता काम की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर भटकते थे और परिवार आर्थिक तंगी से जूझ रहा था।

सौरव ने अपने करियर की शुरुआत आर्ट और स्केच वीडियो से की थी, लेकिन उन्हें असली कामयाबी 2019 में व्लॉगिंग (Vlogging) शुरू करने के बाद मिली। उन्होंने लगातार 365 दिनों तक हर रोज एक वीडियो डालने का संकल्प लिया, जिसने उनकी किस्मत बदल दी। उनके पारिवारिक व्लॉग्स ने दर्शकों का दिल जीत लिया और वे भारत के सबसे तेजी से बढ़ते व्लॉगर्स में शुमार हो गए।

हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सौरव आज यूट्यूब से सालाना 1 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई करते हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने अपनी कमाई का अंदाजा देते हुए कहा था कि वे इतनी कमाई कर लेते हैं जिससे एक 'थार रॉक्स' (Thar Roxx) खरीदी जा सके। उनकी मेहनत ने आज उनके परिवार को गरीबी से निकालकर शोहरत की बुलंदियों तक पहुंचा दिया है।

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लखनऊ के इंदिरा नगर इलाके में एक दुखद घटना सामने आई है। पति द्वारा मज़ाक में ‘बंदरिया’ कहे जाने से आहत होकर तनु नामक महिला ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। तनु ने चार साल पहले प्रेम विवाह किया था और वह मॉडलिंग की शौकीन थीं। परिजनों के अनुसार, हंसी-मज़ाक के दौरान कही गई यह बात उनके लिए बेहद आहत करने वाली साबित हुई, जिसके बाद उन्होंने यह आत्मघाती कदम उठा लिया।

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प्रिय चार लोग !
#shayari

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दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने सोनिया विहार में नकली ब्रांडेड जूतों की फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया। नाइकी, एडिडास और न्यू बैलेंस के जाली जूते बनाने वाले मालिक संदीप सिंह को गिरफ्तार किया गया। छापेमारी में मशीनें, कच्चा माल, 9,600 से अधिक अपर पार्ट्स और 1,667 स्टिकर शीट्स जब्त हुईं।
#delhipolice | #crimebranch | #fakeshoes | #nike | #adidas | #policeaction | #newstvindia |

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भारतीय रेल के सामान्य डिब्बे से एक बार फिर जिंदगी की वह तस्वीर सामने आई है, जिसे अक्सर व्यवस्था अनदेखा कर देती है। ट्रेन में इतनी भीड़ है कि पैर रखने तक की जगह नहीं। हर चेहरा थकान, मजबूरी और चुप्पी की कहानी कह रहा है।
इसी भीड़ में एक युवक अपनी पत्नी और छोटे बच्चों के साथ टॉयलेट के बाहर ज़मीन पर बैठा दिखाई देता है। कभी वह पत्नी को सहारा देता है, तो कभी बच्चों को गोद में सुलाने की कोशिश करता है। डिब्बे में न तो बैठने की जगह है, न ही आराम की कोई उम्मीद।
उस युवक के चेहरे पर न गुस्सा है, न विरोध—क्योंकि उसे मालूम है कि वह स्लीपर या एसी टिकट खरीदने की स्थिति में नहीं है। मजबूरी ने उसे सिखा दिया है कि यह सफर ऐसे ही काटना होगा।
डिब्बे के अंदर कुछ यात्री सीट पर बैठकर खाना खा रहे हैं। वहीं ज़मीन पर बैठे बच्चों की मासूम आंखें उन्हें देख रही हैं—शायद वे यह समझने की कोशिश कर रही हों कि बैठने का अधिकार आखिर किन लोगों के लिए बना है। हैरानी की बात यह है कि किसी ने भी बच्चों को अपनी सीट देने की ज़रूरत महसूस नहीं की।
सवाल यह नहीं है कि नियम क्या कहते हैं, सवाल यह है कि क्या हमारी व्यवस्था और हमारा समाज कभी इन यात्रियों को सम्मानपूर्वक सफर दे पाएगा?
जनरल डिब्बे का किराया चुकाने के बाद भी अगर एक इंसान को बैठने तक की जगह न मिले, तो यह सिर्फ़ भीड़ की समस्या नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सिस्टम—दोनों की विफलता है।
यह दृश्य किसी एक ट्रेन का नहीं है। यह उन लाखों भारतीयों की कहानी है, जो रोज़ अपनी मजबूरी को टिकट बनाकर सफर करते हैं—खामोशी से, बिना शिकायत के।

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