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India lands a knockout at Boxam Elite 2026 🇮🇳🥊
A commanding show in Spain as #teamindia tops the medal table with a stunning 19 medals — 9🥇 | 3🥈 | 7🥉.
From fearless footwork to finishing blows, our golden warriors owned every weight class and announced India’s boxing rise loud and clear.
The gloves are off. The future is golden.
एक सीधा और कड़वा सवाल है।
जब पढ़ाई, एडमिशन और नौकरी जाति के आधार पर तय होती है, तब योग्यता और मेहनत की कीमत क्या रह जाती है? आरक्षण का मकसद सामाजिक बराबरी लाना था, लेकिन क्या आज भी हर फैसले का आधार सिर्फ जाति होना चाहिए? क्या हर गरीब, चाहे किसी भी जाति का हो, उसे समान अवसर नहीं मिलना चाहिए?
और सबसे बड़ा सवाल—जब लगभग हर नीति में जाति का जिक्र होता है, तब वोट हिंदुत्व के नाम पर क्यों मांगा जाता है? अगर समाज को जातियों में बांटा जा रहा है, तो धर्म के नाम पर एकता की अपील कैसी?
देश को आगे बढ़ाना है तो चयन योग्यता, मेहनत और आर्थिक स्थिति के आधार पर होना चाहिए, न कि जन्म के आधार पर।
अब फैसला जनता को करना है—हमें बराबरी चाहिए या राजनीति?
डिस्क्लेमर: यह पोस्ट किसी भी जाति, धर्म या व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है। यह केवल नीतियों और राजनीतिक मुद्दों पर एक सामान्य विचार और सवाल है।