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चीन सीमा से सटी व्यास घाटी के आदि कैलास मार्ग पर स्थित कुटी गांव में 12 वर्षों बाद सात दिवसीय कुंभ पूजा का आयोजन हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ। करीब 12,300 फीट से अधिक की ऊंचाई पर हुए इस धार्मिक आयोजन में पारंपरिक रं संस्कृति और रीति-रिवाजों की अनोखी झलक देखने को मिली।

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Srinagar Gola Market in 1990's & 2026 🛍️

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हिमालय की गोद में बसा है उत्तराखंड का वो स्कूल, जहां पढ़ना हर किसी का सपना! 🏫🏔️

मसूरी की हसीन पहाड़ियों के बीच बसा Woodstock School देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित आवासीय स्कूलों में गिना जाता है। साल 1854 में शुरू हुआ यह संस्थान आज भी अपनी अंतरराष्ट्रीय शिक्षा, खूबसूरत कैंपस और आधुनिक शैक्षणिक माहौल के लिए जाना जाता है। स्कूल में करीब 500 विद्यार्थी पढ़ते हैं और यहां की शिक्षा व्यवस्था में IB के साथ अमेरिकी हाई स्कूल डिप्लोमा का विकल्प भी शामिल है।

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उत्तराखंड के अलग राज्य के आंदोलन की कहानी केवल 1990 के दशक के आंदोलनों से शुरू नहीं होती। इसके पीछे लंबे समय से चल रही सामाजिक जागरूकता, क्षेत्रीय पहचान, आर्थिक असमानता और स्थानीय अधिकारों की लड़ाई की एक लंबी परंपरा रही है। इसी वैचारिक यात्रा में बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल की जोड़ी का महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है।
बद्रीदत्त पांडे ने अपनी पत्रकारिता, लेखन और जनजागरण के जरिए पहाड़ की समस्याओं को लोगों तक पहुंचाया, वहीं इंद्र सिंह नयाल ने कानून, संगठन और प्रशासनिक समझ के माध्यम से इन मुद्दों को मजबूती दी। दोनों की भूमिका अलग थी, लेकिन उद्देश्य एक—पहाड़ के लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना और क्षेत्र के विकास का रास्ता तैयार करना।
✍️ बद्रीदत्त पांडे और 🧑‍⚖️ इंद्र सिंह नयाल की ‘कलम-कानून’ की जोड़ी
1920 के दशक में कुमाऊं की समस्याओं को उठाने के लिए कुमाऊं परिषद एक महत्वपूर्ण मंच बनी। बद्रीदत्त पांडे इसके प्रमुख नेताओं में थे, जबकि युवा इंद्र सिंह नयाल भी इससे जुड़े। नयाल ने 1926 में एलएलबी पूरी की और कानून को पहाड़ के लोगों के अधिकारों की लड़ाई का माध्यम बनाया।
इन दोनों के काम करने का तरीका अलग था। पांडे जी अखबार और लेखन के माध्यम से जनता में राजनीतिक चेतना पैदा करते थे, जबकि नयाल जी कानूनी और संगठनात्मक स्तर पर लोगों के साथ खड़े रहते थे। इसी वजह से उनकी जोड़ी को ‘कलम और कानून’ के मेल के रूप में देखा गया।

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भारतीय शास्त्रीय संगीत को अपनी कला से समृद्ध करने वाले, सुप्रसिद्ध तबला वादक, ‘पद्म विभूषण’ पंडित किशन महाराज जी की जयंती पर उन्हें उत्तर रेलवे की ओर से हृदय कोटि नमन।

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विश्वविख्यात आध्यात्मिक गुरु, Isha Foundation के संस्थापक, 'पद्म विभूषण' श्री Sadhguru जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई।
आध्यात्मिक चेतना के जागरण, प्रकृति संरक्षण तथा लोक-कल्याण के प्रति आपका समर्पण समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
देवाधिदेव महादेव से प्रार्थना है कि आप उत्तम स्वास्थ्य, सुदीर्घ एवं यशस्वी जीवन के साथ अपनी साधना, सेवा और ज्ञान से मानवता को निरंतर आलोकित करते रहें।

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हरि सिंह नलवा के नाम से आज अधिकांश भारतीय अपरचित हैं किन्तु पाकिस्तान, अफगानिस्तान इसे भली भांति परिचित है।
रणनीति और रणकौशल की दृष्टि से हरि सिंह नलवा की तुलना विश्व के श्रेष्ठ सेनानायकों से की गई है।
सर हेनरी ग्रिफिन ने हरि सिंह को "खालसाजी का चैंपियन" कहा है। ब्रिटिश शासकों ने हरि सिंह नलवा की तुलना नेपोलियन से भी की है।
साल 2014 में ऑस्ट्रेलिया की एक पत्रिका, बिलिनियर ऑस्ट्रेलियंस ने इतिहास के दस सबसे महान विजेताओं की सूची जारी की। इस सूची में हरि सिंह नलवा का नाम सबसे ऊपर था।
इतना महान व्यक्ति आखिर कौन था?
हरि सिंह नलवा का जन्म 1791 में 28 अप्रैल को एक उप्पल खत्री सिक्ख परिवार में गुजरांवाला पंजाब में हुआ था। इनके पिता का नाम गुरदयाल सिंह उप्प्पल और माँ का नाम धर्मा कौर था। बचपन में उन्हें घर के लोग प्यार से "हरिया" कहते थे। सात वर्ष की आयु में इनके पिता का देहांत हो गया। 1805 ई. के वसंतोत्सव पर एक प्रतिभा खोज प्रतियोगिता में, जिसे महाराजा रणजीत सिंह ने आयोजित किया था, हरि सिंह नलवा ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा अन्य प्रतियोगिताओं में अपनी अद्भुत प्रतिभा का परिचय दिया। इससे प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें अपनी सेना में भर्ती कर लिया। शीघ्र ही वे महाराजा रणजीत सिंह के विश्वासपात्र सेनानायकों में से एक बन गये।
रणजीत सिंह एक बार जंगल में शिकार खेलने गये। उनके साथ कुछ सैनिक और हरी सिंह नलवा थे। उसी समय एक विशाल आकार के बाघ ने उन पर हमला कर दिया। जिस समय डर के मारे सभी दहशत में थे, हरी सिंह मुकाबले को सामने आए। इस खतरनाक मुठभेड़ में हरी सिंह ने बाघ के जबड़ों को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर उसके मुंह को बीच में से चीर डाला। उसकी इस बहादुरी को देख कर रणजीत सिंह ने कहा ‘तुम तो राजा नल जैसे वीर हो’, तभी से वो ‘नलवा’ के नाम से प्रसिद्ध हो गये। नलवा महाराजा रणजीत सिंह के सेनाध्यक्ष थे। महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में 1807 ई. से लेकर 1837 ई. तक (तीन दशक तक) हरि सिंह नलवा लगातार अफगानों से लोहा लेते रहे। अफगानों के खिलाफ जटिल लड़ाई जीतकर उन्होने कसूर, मुल्तान, कश्मीर और पेशावर में सिख शासन की स्थापना की थी।
अहमदशाह अब्दाली के पश्चात् तैमूर लंग के काल में अफ़ग़ानिस्तान विस्तृत तथा अखंडित था। इसमें कश्मीर, लाहौर, पेशावर, कंधार तथा मुल्तान भी थे। हेरात, कलात, बलूचिस्तान, फारस आदि पर उसका प्रभुत्व था। हरि सिंह नलवा ने इनमें से अनेक प्रदेशों को जीतकर महाराजा रणजीत सिंह के अधीन ला दिया। उन्होंने 1813 ई. में अटक, 1818 ई. में मुल्तान, 1819 ई. में कश्मीर तथा 1823 ई. में पेशावर की जीत में विशेष योगदान दिया।
सरदार हरि सिंह नलवा ने अपने अभियानों द्वारा सिन्धु नदी के पार अफगान साम्राज्य के एक बड़े भाग पर अधिकार करके सिख साम्राज्य की उत्तर पश्चिम सीमांत को विस्तार किया था। नलवे की सेनाओं ने अफ़गानों को खैबर दर्रे के उस ओर खदेड़ कर इतिहास की धारा ही बदल दी। ख़ैबर दर्रा पश्चिम से भारत में प्रवेश करने का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। ख़ैबर दर्रे से होकर ही 500 ईसा पूर्व में यूनानियों के भारत पर आक्रमण करने और लूटपात करने की प्रक्रिया शुरू हुई। इसी दर्रे से होकर यूनानी, हूण, शक, अरब, तुर्क, पठान और मुगल लगभग एक हजार वर्ष तक भारत पर आक्रमण करते रहे। तैमूर लंग, बाबर और नादिरशाह की सेनाओं के हाथों भारत बेहद पीड़ित हुआ था। हरि सिंह नलवा ने ख़ैबर दर्रे का मार्ग बंद करके इस ऐतिहासिक अपमानजनक प्रक्रिया का पूर्ण रूप से अन्त कर दिया था।
हरि सिंह ने अफगानों को पछाड़ कर निम्नलिखित विजयों में भाग लिया: सियालकोट (1802), कसूर (1807), मुल्तान (1818), कश्मीर (1819), पखली और दमतौर (1821-2), पेशावर (1834) और ख़ैबर हिल्स में जमरौद (1836) । हरि सिंह नलवा कश्मीर और पेशावर के गवर्नर बनाये गये। कश्मीर में उन्होने एक नया सिक्का ढाला जो ‘हरि सिन्गी’ के नाम से जाना गया। यह सिक्का आज भी संग्रहालयों में प्रदर्शित है।

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PM ਨਰਿੰਦਰ ਮੋਦੀ ਨੇ ਨਵੀਂ ਦਿੱਲੀ ਦੇ ਹੈਦਰਾਬਾਦ ਹਾਊਸ ਵਿਖੇ ਬੈਲਜੀਅਮ ਦੇ ਪ੍ਰਧਾਨ ਮੰਤਰੀ Bart De Wever ਨਾਲ ਕੀਤੀ ਮੁਲਾਕਾਤ
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