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एशियन गेम्स की चुनौती के लिए तैयार मुक्केबाज!
एची-नागोया एशियन गेम्स 2026 में देश का परचम लहराने के लक्ष्य के साथ भारतीय बॉक्सिंग दल जापान रवाना हो गया है। गेम्स से पहले जापान में होने वाले प्री-गेम्स ट्रेनिंग कैंप में भारतीय मुक्केबाज अपनी तैयारियों को और मजबूत करेंगे।
💪 मंजिल एक—पदक और तिरंगे की शान!
टीम इंडिया को ढेरों शुभकामनाएं!
🙌 कमेंट में एक 🇮🇳 जरूर छोड़ें और भारतीय मुक्केबाजों का हौसला बढ़ाएं।

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मेरे निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी कैण्ट के रुद्राक्ष में आज गर्भवती एवं धात्री महिलाओं, बच्चों, किशोरियों तथा उनके परिवारों के पोषण, स्वास्थ्य और देखभाल को समर्पित 'राष्ट्रीय पोषण माह' के शुभारंभ कार्यक्रम में मा. मुख्यमंत्री श्री MYogiAdityanath जी महाराज एवं मा. केंद्रीय मंत्री श्रीमती Annapurna Devi जी के साथ सम्मिलित हुआ।
समर्थ, शिक्षित, स्वस्थ और सशक्त भारत के निर्माण हेतु सक्षम आंगनवाड़ी केंद्रों की इस वर्ष की थीम 'मेरी आंगनवाड़ी, मेरी जिम्मेदारी' रखी गई है।
हर आंगनवाड़ी बहन, सहायिका तथा ग्राम पंचायत के नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी-अपनी आंगनवाड़ी की जिम्मेदारी लेकर आदरणीय प्रधानमंत्री श्री Narendra Modi जी के विजन 'आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत' के निर्माण में अपना योगदान दें।

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आधुनिक हिंदी साहित्य के ‘पितामह’, महान नाटककार भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।

उन्होंने अपनी प्रखर लेखनी से न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना और मातृभाषा के प्रति स्वाभिमान की नई अलख जगाई।

उनका व्यक्तित्व-कृतित्व हमें अपनी भाषाओं, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा की प्रेरणा देता रहेगा।

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आधुनिक हिंदी साहित्य के ‘पितामह’, महान नाटककार भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।

उन्होंने अपनी प्रखर लेखनी से न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना और मातृभाषा के प्रति स्वाभिमान की नई अलख जगाई।

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आधुनिक हिंदी साहित्य के ‘पितामह’, महान नाटककार भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।

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उनका व्यक्तित्व-कृतित्व हमें अपनी भाषाओं, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा की प्रेरणा देता रहेगा।

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आधुनिक हिंदी साहित्य के ‘पितामह’, महान नाटककार भारतेन्दु हरिश्चंद्र की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।

उन्होंने अपनी प्रखर लेखनी से न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय जनमानस में राष्ट्रीय चेतना और मातृभाषा के प्रति स्वाभिमान की नई अलख जगाई।

उनका व्यक्तित्व-कृतित्व हमें अपनी भाषाओं, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता की रक्षा की प्रेरणा देता रहेगा।

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समुद्र में बहकर जाने वाले नदियों के मीठे पानी को रोककर उसका इस्तेमाल करने की भारत की महत्वाकांक्षी योजना अब चर्चा में है। गुजरात सरकार की कल्पसर परियोजना के तहत खंभात की खाड़ी में करीब 60 से 64 किलोमीटर लंबा बांध या डाइक बनाने की योजना है। इसके जरिए लगभग 7,800 मिलियन क्यूबिक मीटर (MCM) मीठे पानी को इकट्ठा कर एक विशाल तटीय मीठे पानी का जलाशय तैयार किया जाएगा। 🌊💧

इस परियोजना के तहत साबरमती, माही, धाधर और नर्मदा जैसी नदियों के अपवाह और समुद्र में बह जाने वाले मीठे पानी को जलाशय में रोका जाएगा। इससे करीब 1,600 से 2,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली विशाल कृत्रिम मीठे पानी की झील तैयार होने की उम्मीद है। इसका सबसे बड़ा फायदा गुजरात के सूखाग्रस्त सौराष्ट्र क्षेत्र को मिलेगा।

परियोजना के जरिए सौराष्ट्र के 9 जिलों और 42 तालुकों में करीब 10 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने का लक्ष्य है। इससे पानी की कमी के कारण होने वाले फसल नुकसान को कम करने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

कल्पसर परियोजना का फायदा सिर्फ पानी तक सीमित नहीं रहेगा। खंभात की खाड़ी पर बनने वाले बांध के साथ सड़क और रेल कॉरिडोर से भावनगर और सूरत के बीच की दूरी कम होने की उम्मीद है। इससे यात्रा, परिवहन और ईंधन की लागत घट सकती है और क्षेत्र में व्यापार एवं उद्योग को बढ़ावा मिल सकता है।

परियोजना के तहत करीब 2,470 मेगावाट सौर और पवन ऊर्जा के उत्पादन का भी प्रस्ताव है। वहीं, इसकी अनुमानित निर्माण लागत करीब ₹1.25 लाख करोड़ से ₹1.33 लाख करोड़ के बीच बताई गई है। गुजरात सरकार इस परियोजना पर काम कर रही है, जिसमें केंद्र सरकार और नीदरलैंड्स की तकनीकी विशेषज्ञता भी शामिल है।

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तृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले कारगिल विजय के अमर नायक, परमवीर चक्र से सम्मानित, वीर योद्धा कैप्टन विक्रम बत्रा की जयंती पर विनम्र श्रद्धांजलि।
कारगिल की चोटियों पर उनका पराक्रम हर भारतीय के हृदय में राष्ट्रप्रेम और शौर्य की भावना को सदैव जागृत करता रहेगा।

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उत्तराखंड का कैंची धाम बाबा नीम करोली महाराज से जुड़ी आस्था की बड़ी जगहों में से एक है, लेकिन इसके बनने की कहानी बेहद खास है। 1942 में पूर्णानंद तिवारी की बाबा नीम करोली महाराज से पहली मुलाकात हुई थी। उस समय बाबा ने उनसे कहा था कि वे उन्हें पूरे 20 साल बाद दोबारा देखेंगे। 25 मई 1962 को यह बात सच हुई, जब बाबा कैंची गांव पहुंचे और पूर्णानंद तिवारी से फिर मुलाकात हुई। इसके बाद बाबा ने क्षिप्रा नदी के दूसरी ओर स्थित जंगल में जाकर एक शिला पर बैठकर इस जगह को आश्रम के लिए चुना।

पुरानी यज्ञशाला के स्थान पर निर्माण शुरू हुआ और धीरे-धीरे हनुमान मंदिर समेत कई मंदिर और आश्रम तैयार होते गए। खास बात यह है कि कैंची धाम का निर्माण किसी पेशेवर आर्किटेक्ट या तैयार नक्शे के आधार पर नहीं हुआ।

श्री कैंची धाम मंदिर ट्रस्ट के मुताबिक, निर्माण बाबा के निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ता रहा। बाद में यहां लक्ष्मी नारायण, शिव परिवार और अन्य मंदिरों के साथ अद्वैत आश्रम भी बनाया गया। 15 जून को धाम का मुख्य उत्सव मनाया जाता है और इसी तारीख को बाबा नीम करोली महाराज की प्रतिमा की स्थापना का फैसला भी लिया गया था।

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