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7 से 9 फरवरी के बीच छत्तीसगढ़ में ‘बस्तर पंडुम’ का विशेष आयोजन किया गया। इस उत्सव के दौरान बस्तर की समृद्ध संस्कृति, परंपरा और जनजातीय विरासत का भव्य रूप दिखा। इस प्रयास से जुड़े अपने सभी परिवारजनों को मेरी हार्दिक बधाई। ऐसे आयोजन हमारी सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

पहले जब बस्तर का नाम लिया जाता था तो माओवाद, हिंसा और विकास में पिछड़ेपन की छवि उभरती थी। लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। आज बस्तर विकास के साथ-साथ स्थानीय लोगों के बढ़ते आत्मविश्वास के लिए जाना जाता है। मेरी यही कामना है कि यहां का आने वाला समय शांति, प्रगति और सांस्कृतिक गौरव की भावना से परिपूर्ण हो।

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Introduction to Cogni 3 Omega and Omega-3 Nutrition

In today’s demanding lifestyle, maintaining cognitive sharpness and physical well-being has become a priority for people of all ages. Nutritional gaps caused by processed foods and irregular eating habits have increased reliance on supplements, especially Omega-3 fatty acids.

Read more:- https://vefalifesciences.blogs....pot.com/2026/02/intr

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How can I get ISO Certification in Ghana?
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गैसपुरा के इलाके से लूट का मामला आया सामने
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मैं ठाकुर हूँ…” — बस इतना कहा उसने,
और पूरा सोशल मीडिया आगबबूला हो गया।
कहा गया — जातिवाद है, घमण्ड है, गलत है।
पर सच ये भी है कि जिस देश में फॉर्म भरने से लेकर शादी के विज्ञापनों तक जाति पूछी जाती हो,
जहाँ राजनीति, योजनाएँ, एडमिशन, नौकरी — सब जगह जाति खुलकर इस्तेमाल होती हो,
वहाँ अपनी पहचान बताना अचानक अपराध कैसे बन गया?
सिस्टम जाति पूछे तो ठीक,
वोट जाति पर माँगे जाएँ तो ठीक,
रिज़र्वेशन और राजनीति जाति पर चले तो ठीक…
पर कोई अपनी जाति बोल दे तो बवाल?
समस्या शायद जाति से नहीं,
बल्कि सच सुनने से है।
सोचिए — दोहरा मापदंड कब तक चलेगा?
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उस लड़की ने बस इतना कहा — “ठाकुर हूँ मैं.. मुझसे बकचोदी मत करना साले।"
और देश का पूरा इकोसिस्टम अलर्ट मोड में आ गया ! टाइमलाइन गरम हुई, नैतिकता जाग उठी, सोशल मीडिया में भारी आक्रोश मच गया। अरे ये लड़की तो जातिवाद कर रही है। ऊँची जाति होने का घमण्ड दिखा रही है। ब्ला ब्ला।
पर ज़रा ठहरो ! एक बात हमारी भी सुनो फिर फैसला करना।
हम उसी देश में रहते हैं, जहाँ जाति प्रमाणपत्र सरकार खुद जारी करती है। फॉर्म से लेकर शादी के विज्ञापनों तक, हर जगह जाति लिखी जाती है। सरकारी योजनाएँ, करियर के मौके, राजनीति, सब में जाति खुलकर इस्तेमाल होती है। वोट भी जाति के नाम पर माँगे जाते हैं।
एडमिशन में जाति, नौकरी में जाति ,राजनीति में जाति, शादी में जाति वो सब आपके लिए ठीक हैं।
पर फिर उस लड़की का “ ठाकुर हूँ मैं” बोलना अपराध कैसे? ये कोरा दोगलापन है आपका।
इस लड़की ने ठाकुर होने का मुचलका भरा है। कीमत चुकाई है। उसको बचपन से आपने बताया है कि वो ठाकुर हूँ। और उससे ठाकुर होने की कीमत समय समय पर वसूलता रहेगा ये सिस्टम।
इसके दलित दोस्तों ने कभी एग्जाम फ़ीस नहीं दी होगी.. क्योंकि इस ठाकुर लड़की से इस सिस्टम ने चार गुना फीस वसूली थी। बेशक़ सब ही गरीब और संघर्षरत रहे होंगे.. इस ठाकुर लड़की को सवर्ण होने के कारण अधिक मेरिट पर भी रेस से बाहर होना पड़ा होगा।
इस लड़की को तुमने समय समय पर एहसास करवाया है कि वो ठाकुर है। अब अगर वो प्राउडली कह रही है कि मैं ठाकुर हूँ.. तो तुमको मिर्च क्यों लग रही है दोस्त।
दोगलेपन को बेनकाब करना मेरा शौक है।

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