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राष्ट्रीय ध्वज 'तिरंगा' के अभिकल्पक, महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिंगली वेंकैया जी की पुण्यतिथि पर उन्हें कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि।
भारत का राष्ट्रीय ध्वज केवल तीन रंगों का एक सुंदर संयोजन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों भारतीयों की आस्था, आत्मसम्मान, स्वाभिमान, त्याग, बलिदान, संघर्ष, एकता और अखंडता का अमर प्रतीक है। इस गौरवशाली तिरंगे को स्वरूप देने वाले महान राष्ट्रभक्त पिंगली वेंकैया जी का योगदान भारतीय इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा। उनका जीवन राष्ट्रसेवा, समर्पण, दूरदृष्टि और अद्भुत देशभक्ति का अनुपम उदाहरण है।
पिंगली वेंकैया जी ने अपना संपूर्ण जीवन भारत माता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अनेक देशों के ध्वजों का गहन अध्ययन किया और एक ऐसे राष्ट्रीय ध्वज की कल्पना की जो भारत की विविधता में एकता, सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व कर सके। उनके अथक प्रयासों और राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण का ही परिणाम है कि आज हमारा तिरंगा विश्वभर में भारत की गरिमा, गौरव और पहचान के रूप में सम्मानपूर्वक लहराता है।

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आज पूज्य पिताश्री डॉ. नारायण लाल नड्डा जी के 101वें जन्मदिवस के अवसर पर उनके साथ स्नेहिल क्षण बिताये और आशीर्वाद प्राप्त किया।
पिता का स्नेह और मार्गदर्शन जीवन की सबसे अनमोल पूंजी होती हैं। उनके दिए हुए संस्कार, आदर्श और आशीर्वाद ही मेरे जीवन की वास्तविक शक्ति और सबसे बड़ी निधि हैं। आज उनके साथ बिताए प्रत्येक क्षण मेरे लिए प्रेरणा, ऊर्जा और भावनात्मक संबल का स्रोत बना है।
ईश्वर से कामना करता हूँ कि पूज्य पिताश्री को उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु प्रदान करें तथा उनका स्नेहिल आशीर्वाद सदैव हम सभी पर बना रहे।

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आज पूज्य पिताश्री डॉ. नारायण लाल नड्डा जी के 101वें जन्मदिवस के अवसर पर उनके साथ स्नेहिल क्षण बिताये और आशीर्वाद प्राप्त किया।
पिता का स्नेह और मार्गदर्शन जीवन की सबसे अनमोल पूंजी होती हैं। उनके दिए हुए संस्कार, आदर्श और आशीर्वाद ही मेरे जीवन की वास्तविक शक्ति और सबसे बड़ी निधि हैं। आज उनके साथ बिताए प्रत्येक क्षण मेरे लिए प्रेरणा, ऊर्जा और भावनात्मक संबल का स्रोत बना है।
ईश्वर से कामना करता हूँ कि पूज्य पिताश्री को उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु प्रदान करें तथा उनका स्नेहिल आशीर्वाद सदैव हम सभी पर बना रहे।

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आज पूज्य पिताश्री डॉ. नारायण लाल नड्डा जी के 101वें जन्मदिवस के अवसर पर उनके साथ स्नेहिल क्षण बिताये और आशीर्वाद प्राप्त किया।
पिता का स्नेह और मार्गदर्शन जीवन की सबसे अनमोल पूंजी होती हैं। उनके दिए हुए संस्कार, आदर्श और आशीर्वाद ही मेरे जीवन की वास्तविक शक्ति और सबसे बड़ी निधि हैं। आज उनके साथ बिताए प्रत्येक क्षण मेरे लिए प्रेरणा, ऊर्जा और भावनात्मक संबल का स्रोत बना है।
ईश्वर से कामना करता हूँ कि पूज्य पिताश्री को उत्तम स्वास्थ्य व दीर्घायु प्रदान करें तथा उनका स्नेहिल आशीर्वाद सदैव हम सभी पर बना रहे।

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4 जुलाई/स्थापना-दिवस
आजाद हिन्द फौज की स्थापना
सामान्य धारणा यह है कि आजाद हिन्द फौज और आजाद हिन्द सरकार की स्थापना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने जापान में की थी; पर इससे पहले प्रथम विश्व युद्ध के बाद अफगानिस्तान में महान क्रान्तिकारी राजा महेन्द्र प्रताप ने आजाद हिन्द सरकार और फौज बनायी थी। इसमें 6,000 सैनिक थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इटली में क्रान्तिकारी सरदार अजीत सिंह ने ‘आजाद हिन्द लश्कर’ बनाई तथा ‘आजाद हिन्द रेडियो’ का संचालन किया। जापान में रासबिहारी बोस ने भी आजाद हिन्द फौज बनाकर उसका जनरल कैप्टेन मोहन सिंह को बनाया। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से सैन्य बल द्वारा मुक्त कराना ही इस फौज का उद्देश्य था।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस 5 दिसम्बर, 1940 को जेल से मुक्त हो गये; पर उन्हें कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया। 18 जनवरी, 1941 को नेताजी गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी जा पहुँचे और हिटलर से भेंट की। वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आजाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर इसे और व्यापक रूप देने को कहा। जर्मनी में बन्दी ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों से सुभाष बाबू ने भेंट की। जब उनके सामने ऐसी सेना की बात रखी गयी, तो उन सबने इस योजना का स्वागत किया।

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4 जुलाई/स्थापना-दिवस
आजाद हिन्द फौज की स्थापना
सामान्य धारणा यह है कि आजाद हिन्द फौज और आजाद हिन्द सरकार की स्थापना नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने जापान में की थी; पर इससे पहले प्रथम विश्व युद्ध के बाद अफगानिस्तान में महान क्रान्तिकारी राजा महेन्द्र प्रताप ने आजाद हिन्द सरकार और फौज बनायी थी। इसमें 6,000 सैनिक थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इटली में क्रान्तिकारी सरदार अजीत सिंह ने ‘आजाद हिन्द लश्कर’ बनाई तथा ‘आजाद हिन्द रेडियो’ का संचालन किया। जापान में रासबिहारी बोस ने भी आजाद हिन्द फौज बनाकर उसका जनरल कैप्टेन मोहन सिंह को बनाया। भारत को अंग्रेजों के चंगुल से सैन्य बल द्वारा मुक्त कराना ही इस फौज का उद्देश्य था।
नेताजी सुभाषचन्द्र बोस 5 दिसम्बर, 1940 को जेल से मुक्त हो गये; पर उन्हें कोलकाता में अपने घर पर ही नजरबन्द कर दिया गया। 18 जनवरी, 1941 को नेताजी गायब होकर काबुल होते हुए जर्मनी जा पहुँचे और हिटलर से भेंट की। वहीं सरदार अजीत सिंह ने उन्हें आजाद हिन्द लश्कर के बारे में बताकर इसे और व्यापक रूप देने को कहा। जर्मनी में बन्दी ब्रिटिश सेना के भारतीय सैनिकों से सुभाष बाबू ने भेंट की। जब उनके सामने ऐसी सेना की बात रखी गयी, तो उन सबने इस योजना का स्वागत किया।

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