उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में खरेही का टम्टूड़ा चौगांवछीना एक ऐसा गांव है, जिसने इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया है। यह वही धरती है, जहां जन्म हुआ एक ऐसी महिला का, जिसने समाज, राजनीति और महिला सशक्तिकरण की नई परिभाषा लिखी — सरस्वती टम्टा।
👉 20 जनवरी 1932 को जन्मीं सरस्वती टम्टा, मनोरथ राम टम्टा की पुत्री थीं। उनके परिवार में शिक्षा और सामाजिक जागरूकता को हमेशा प्राथमिकता दी जाती थी। इसी सोच ने उन्हें आगे बढ़ने और समाज में बदलाव लाने की प्रेरणा दी।
✨ उन्होंने उस दौर में राजनीति में कदम रखा, जब महिलाओं की भागीदारी बेहद सीमित थी। लेकिन उन्होंने इस चुनौती को अवसर बनाया और 1969 व 1974 में विधायक बनकर उत्तराखंड की पहली महिला अनुसूचित जाति विधायक बनने का गौरव हासिल किया।
👉 उनका मानना था — “नारी केवल सहन करने के लिए नहीं बनी, बल्कि समाज की दिशा बदलने के लिए बनी है।”
🌿 अपने कार्यकाल में उन्होंने कई ऐतिहासिक कार्य किए:
• एशिया की सबसे ऊंचाई पर स्थित खरेई लिफ्ट पेयजल योजना को सफल बनाया
• झिरौली मैग्नेसाइट फैक्ट्री को अल्मोड़ा से काफलीगैर शिफ्ट कराने में अहम भूमिका
• बागेश्वर को तहसील का दर्जा दिलाया
• 1974 में बागेश्वर डिग्री कॉलेज की स्थापना कराई
• स्वास्थ्य, सड़क और प्रशासनिक ढांचे को मजबूत किया
🔥 1994 के उत्तराखंड आंदोलन में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई और महिला जागरूकता को नई ऊंचाई दी। उनका सपना था कि महिलाएं समाज और राजनीति दोनों में बराबर भागीदारी निभाएं।
🙏 30 अप्रैल 2007 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी सोच और कार्य आज भी जीवित हैं।
उनके पुत्र एडवोकेट विमल कुमार टम्टा के अनुसार, सरस्वती जी ने एक ऐसा समाज बनाने का सपना देखा था, जहां महिलाएं घर के साथ-साथ शासन में भी अपनी भूमिका निभाएं।
🎓 उनकी स्मृति में सरस्वती टम्टा स्मारक राजकीय इंटर कॉलेज, देवलधार का नामकरण किया गया है। स्थानीय लोग आज भी मांग करते हैं कि खरेई में उनके नाम पर एक संग्रहालय बनाया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके संघर्ष और योगदान से प्रेरणा ले सकें।
✨ सरस्वती टम्टा का जीवन सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं था, बल्कि यह शिक्षा, साहस और समाज सुधार का जीवंत उदाहरण है।
👉 सच में, ऐसी महान हस्तियां कभी नहीं जातीं… वे अपनी सोच और प्रेरणा के रूप में हमेशा जीवित रहती हैं ❤️
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