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भरत तिवारी मामले में नया मोड़ सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संजीव कुमार ने मामले को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। अधिवक्ता का दावा है कि भरत तिवारी की ह/त्या कथित तौर पर 1,400 करोड़ रुपये के घोटाले को दबाने के लिए रची गई एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा थी।
अधिवक्ता के मुताबिक, भरत तिवारी ने पुलिस के सामने सरेंडर किया था, इसके बावजूद उन्हें अलग-अलग पुलिसकर्मियों के हथियारों से गोलियां मारे जाने का आरोप है। उन्होंने पोस्टमार्टम, बैलिस्टिक और सुपरविजन रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि पांचों गोलियां अलग-अलग समय पर चलाई गई थीं।
आरोप के अनुसार, भरत तिवारी को पहले गंभीर रूप से घायल किया गया और बाद में गाड़ी के अंदर बेहद करीब से गोली मारी गई। अधिवक्ता का दावा है कि इस पूरी कार्रवाई का उद्देश्य कथित तौर पर भरत तिवारी को जीवित बचने से रोकना और उनके पास मौजूद जानकारी को सामने आने से रोकना था।
मामले में तत्कालीन अधिकारियों और संबंधित पुलिसकर्मियों के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करने की मांग को लेकर अर्जी दाखिल किए जाने की जानकारी भी सामने आई है।
हालांकि, ये सभी आरोप फिलहाल आरोप और दावे हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है। मामले में वास्तविक तथ्य और अंतिम जिम्मेदारी न्यायिक प्रक्रिया एवं अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही स्पष्ट होगी।
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बिहार में साल 2016 से लागू शराबबंदी को लेकर नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक नई रिसर्च सामने आई है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शराबबंदी लागू होने के बाद महिलाओं के खिलाफ हिं*सा में अपेक्षित कमी नहीं देखी गई। साथ ही, अवैध शराब और अन्य नशीले पदार्थों के सेवन में बढ़ोतरी की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, शराबबंदी अपने प्रमुख उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाई है। शोधकर्ताओं ने NCRB के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बिहार में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में बढ़ोतरी हुई है। हालांकि, रिपोर्ट यह भी स्पष्ट करती है कि अपराध की घटनाओं के साथ-साथ शिकायत और रिपोर्टिंग बढ़ने का असर भी इन आंकड़ों पर पड़ सकता है।
NCAER की रिसर्च में शराबबंदी के कारण राज्य को होने वाले आबकारी राजस्व के नुकसान का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुमान के मुताबिक, यदि शराबबंदी हटाई जाती है तो बिहार के राजस्व में करीब 14 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है।
शोधकर्ताओं का सुझाव है कि अतिरिक्त राजस्व का इस्तेमाल शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में किया जा सकता है।
रिपोर्ट में बिहार सरकार से मौजूदा शराबबंदी नीति पर पुनर्विचार करने और इसे हटाने की सिफारिश की गई है। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि शराबबंदी हटाने का यह सरकार का फैसला नहीं है, बल्कि NCAER से जुड़े शोधकर्ताओं की सिफारिश है।
अब इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद बिहार में शराबबंदी की नीति को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होने की संभावना है।
आपकी क्या राय है—बिहार में शराबबंदी जारी रहनी चाहिए या सरकार को नीति में बदलाव पर विचार करना चाहिए?
कमेंट में अपनी राय जरूर बताएं।
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