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No One Heard My Side… Because I’m a Man|Sarvjeet Singh|Josh Talks
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****ly to become speaker at Josh Talks- https://forms.gle/d23aj3x7c5BuBjnf6
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They Said I Wasn’t Beautiful Here’s What I Learned" | Nayab Midha | Josh Talks
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बच्चा खिलाने के बहाने किशोरी को घर बुलाया देवर से कराया रेpप, आरोपी महिला गिरफ्तार
लखनऊ के ठाकुरगंज इक़लाके की रहने वाली समीरा पर एक छोटा बच्चा है जिसे खिलाने के लिए पड़ोस की एक किशोरी अक्सर आती जाती रहती थी रविवार को समीरा ने किशोरी को आवाज देकर घर बुलाया खिलाने के लिए उसकी गोद में अपना बच्चा दे दिया और फिर फोन कर अपने देवर दानिश को किशोरी के घर होने की जानकारी दी दानिश घर पहुंचा और किशोरी के साथ अश्लील हरकतें करने लगा किशोरी को पैसों का लालच भी दिया ज़ब वह नहीं मानी तो भावी ने बाहर से दरवाजा लॉक कर दिया और देवर ने किशोरी के साथ जबरन रेpप किया, किशोरी ने घटना की जानकारी परिजनों को दी पुलिस ने #मुकदमा दर्ज कर #आरोपी भावी #समीरा को गिरफ्तार कर लिया है
क्या ये काम भारत मे भी हो बताना जरूर 🙏🏻🚩🙏🏻
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मुंबई से सामने आई यह खबर दिल दहला देने वाली है। 😢
बताया जा रहा है कि रात करीब 1 बजे परिवार ने तरबूज खाया, जिसके बाद अचानक उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। देखते ही देखते हालत इतनी गंभीर हो गई कि माता-पिता और उनकी दो मासूम बेटियों की जान नहीं बचाई जा सकी।
यह घटना सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है। अक्सर हम बिना सोचे-समझे कटे हुए फल, खुले में रखी चीजें या बिना जांच-पड़ताल के खरीदा हुआ सामान खा लेते हैं। लेकिन कई बार यही लापरवाही खतरनाक साबित हो सकती है।
फिलहाल उस तरबूज को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है, ताकि असली वजह सामने आ सके—क्या उसमें कोई केमिकल था, ज़;हर मिलाया गया था या फिर यह फूड पॉइ#जनिंग का मामला है। सच सामने आना बेहद जरूरी है।
इस दुखद घटना ने एक बार फिर हमें सावधान रहने की जरूरत याद दिला दी है। खाने-पीने की चीजों को लेकर थोड़ी सी सतर्कता हमारी और हमारे परिवार की जिंदगी बचा सकती है।
ईश्वर दिवंगत आत्माओं को शांति दे और परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे। 🙏💔
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देश का कानून मै इतने अनुछेद है इतने अनुच्छेद है अपराधी किसी न किसी छेद से बाहर आ ही जाता है यही तो देश का दुर्भाग्य है जभी कोई अपराध करने से पहले सोचता भी नही है इतना गंदा कृत्य किया था इसने और बेल वाह रे कानून। अब अपराध करने से पहले कौन डरेगा जब कानून ऐसा काम करेगा
जब सिस्टम की फाइलों में जमीर मर जाता है, तब एक आम आदमी को अपना हक पाने के लिए मौत की नुमाइश करनी पड़ती है।
सिस्टम की इस बेशर्मी पर अब क्या ही लिखा जाए, जहाँ कागज़ों का वज़न एक गरीब की तकलीफ से कहीं ज्यादा भारी हो गया है! जब नियम-कायदे इतने अंधे हो जाएं कि उन्हें एक जिंदा इंसान की सिसकियां सुनाई न दें और मर चुके इंसान का सबूत मांगने के लिए वो किसी को उसकी हदों तक तोड़ दें, तो समझ लेना चाहिए कि हमारा समाज अंदर से मर चुका है। धिक्कार है ऐसी तरक्की पर और ऐसी डिजिटल दुनिया पर, जहाँ एक भाई को अपनी बहन के हक के लिए उसकी रूह तक को सड़कों पर लाकर खड़ा करना पड़े, सिर्फ इसलिए क्योंकि साहब को फाइल पूरी करनी थी।
ये बाबूशाही और दफ्तरों के चक्कर दरअसल इंसानियत का कत्ल करने के कारखाने बन चुके हैं। हम बड़ी-बड़ी बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन असलियत ये है कि आज भी एक आम आदमी के लिए इंसाफ और अपना ही हक पाना किसी जंग से कम नहीं है। क्या फायदा उन कंप्यूटरों और लंबी-चौड़ी मशीनों का, जो एक बेबस इंसान की आंखों का दर्द नहीं पढ़ सकतीं? ये सिर्फ एक बैंक या एक विभाग की बात नहीं है, ये उस सड़े हुए दिमाग की कहानी है जो कहता है कि 'इंसान मर जाए तो मर जाए, बस कागज नहीं छूटना चाहिए'। अगर किसी की लाचारी का ऐसा तमाशा बनाने के बाद भी हुक्मरानों की नींद नहीं टूटती, तो मान लीजिए कि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ सिस्टम को चलाने वाले इंसान नहीं, बल्कि पत्थर के पुतले हैं। अब और कितनी मौतें देखोगे साहब, एक आदमी को यकीन दिलाने के लिए और कितना गिरना पड़ेगा?
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शायद नियमों की बेडियां जब मानवीय संवेदनाओं से बडी हो जाती हैं, तब जीतू मंडा जैसी बेबसी जन्म लेती है।
शायद नियमों की बेडियां जब मानवीय संवेदनाओं से बडी हो जाती हैं, तब जीतू मुंडा जैसी बेबसी जन्म लेती है।
यह हृदयविदारक घटना कदुझर के दिआनाली गांव की है।
ओडिशा की ये घटना मानवता को शर्मसार करती है और हमसे सवाल करती है कि आखिर हमारा सिस्टम किसके लिए काम करता है ?
एक गरीब आदिवासी यूवक जीत् मुंडा की बहन की दो महीने पहले मौत हो गर्ड थी। उसकी बहन के खाते में र19,300 बचे थे - कोई बडी रकम नहीं, लेकिन उसके जैसे डंसान के लिए वही जीवन और मौत का फर्क हो सकती थी। वह बार-बार बैंक गया, हाथ जोडे और कह कि उसे उसकी मरह्रम बहन के खाते के पैसे की सख्त जरूरत है। उसे एक ही जवाब मिला "खाताधारक को खद आकर साइन करना होगा"
उसने हर बार सफाई दी कि उसकी बहन अब इस दूनिया में नहीं है। लेकिन उसकी बात किसी ने नहीं सुनी, कागज़ के काल्पनिक नियम इंसान की सच्चाई से बडे हो गए।
संवेदनाएं हमारे समाज में गरीबी की विवशताओं पर कब का अहसास खो चूकी हैं ।! और फिर जो हुआ, वह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है।
मजबरी में वह अपनी बहन के कंकाल के अवशेष लेकर बैंक आ पहंचा -- सिर्फ यह साबित करने के लिए कि वह सच बोल रहा था
जरा सोचिए, एक भाई को अपनी बहन की हड्डियां लेकर बैंक क्यों जाना पडा ?
यह सिर्फ एक आदमी की कहानी नहीं है. यह उस संवेदनहीन सिस्टम का चेहरा है जो गरीब. आदिवासी और दलितों के साथ अक्सर ऐसा ही व्यवहार करता है।
जहां ताकतवर लोगों के लिए नियम मोड़़ दिए जाते हैं, फाइलें दौडने लगती है वहीं गरोब के लिए वही नियम दीवार बन जाते हैं।
हम खुद को द्निया की चौथी सबसे बडी अर्थव्यवस्था कहकर गर्व करते हैं। लेकिन क्या इस "विकास" का कोर्ड मतलब है, अगर एक गरीब को अपने हक के र19,000 पाने के लिए अपनी बहन की हडियां उठानी पड़ं?
यह घटना बताती है कि हमारे सिस्टम में इंसानियत से ज्यादा कागज की कीमत है. दर्द से ज्यादा प्रक्रिया की अर्हमियत है। गरीब की आवाज आज भी उतनी हं कमजोर है, जितनी पहले थी।
सवाल यह है - जीत मंडा की इस हालत का कोर्ड कभी जिम्मेदार ठहराया जाएगा?
और उससे भी बडा सवाल - कितने और जीत मंडा हर रोज इसी तरह चपचाप अपमान और पीडा झेल रहे हैं ?
अन्कति #shrikantacademysahlour #photographychallengechallengeraphychall engechallenge #shrikantsir #followersreels