भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों में बसती है। हाल ही में सामने आए एक सर्वे ने इस भावना को और मजबूत किया है—जिसके मुताबिक 90% हिंदू भारत में गुरुकुल शिक्षा पद्धति की वापसी के पक्ष में हैं। यह सिर्फ एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से फिर से जुड़ने की एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।
गुरुकुल केवल पढ़ाई का स्थान नहीं होता था, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने का केंद्र होता था। यहाँ शिष्य को सिर्फ गणित, व्याकरण या शास्त्रों का ज्ञान नहीं मिलता था, बल्कि अनुशासन, सेवा, राष्ट्रप्रेम, करुणा और आत्मनिर्भरता जैसे मूल्यों का संस्कार भी मिलता था। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं रहती थी—वह व्यवहार, आचरण और चरित्र निर्माण का माध्यम बनती थी।
आज के समय में जब शिक्षा अक्सर अंकों, प्रतिस्पर्धा और करियर तक सिमट गई है, तब गुरुकुल की अवधारणा एक संतुलन पेश करती है—जहाँ आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ वैदिक ज्ञान, योग, ध्यान और नैतिक शिक्षा भी साथ चलती है। समर्थकों का मानना है कि इस समन्वय से एक ऐसा युवा वर्ग तैयार होगा, जो न केवल कुशल होगा, बल्कि संवेदनशील, जिम्मेदार और देशभक्त भी होगा।
गुरुकुल प्रणाली की वापसी का विचार यह भी संकेत देता है कि भारत अपनी पहचान को लेकर जागरूक हो रहा है। यह बदलाव सिर्फ अतीत की ओर लौटना नहीं, बल्कि भविष्य को मजबूत नींव पर खड़ा करने का प्रयास है—जहाँ परंपरा और प्रगति हाथ में हाथ डालकर चलें।
क्या हम इस बदलाव के लिए तैयार हैं? अगर शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि जीवन निर्माण हो—तो गुरुकुल की भावना हमें उस दिशा में ले जा सकती है।