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"नर्मदेश्वर महादेव"
काशी वाराणसी में स्थित अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिरों में एक श्री नर्मदेश्वर महादेव
साक्षात भगवान शिव का स्वरूप हैं, जो नर्मदा नदी के प्राकृतिक पत्थरों से बनते हैं। इनकी महिमा अपरंपार है और मान्यता है कि "नर्मदा का हर कंकर शंकर है"। यह दुनिया के एकमात्र ऐसे शिवलिंग हैं, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें किसी शिल्पकार द्वारा तराशा नहीं जाता, बल्कि ये माँ नर्मदा के जल प्रवाह में प्राकृतिक रूप से आकार लेते हैं। इसलिए ये स्वयंभू (स्वयं प्रकट) माने जाते हैं। शिव महापुराण के अनुसार, नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। चूँकि ये स्वयं सिद्ध होते हैं, इन्हें घर में स्थापित करने के लिए किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।
अन्य शिवलिंगों पर चढ़ाया गया प्रसाद या भोग ग्रहण नहीं किया जाता, लेकिन नर्मदेश्वर महादेव पर चढ़ाया गया प्रसाद बहुत पवित्र माना जाता है और इसे खाया जा सकता है। घर में इनकी पूजा करने से वास्तु दोष दूर होते हैं और साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों फलों की प्राप्ति होती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, माता नर्मदा ने ब्रह्मा जी से गंगा के समान पाप नाशिनी और मोक्षदायिनी बनने का वरदान मांगा था। बाद में भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि नर्मदा नदी से निकलने वाला हर पत्थर (बाणलिंग) नर्मदेश्वर के रूप में पूजा जाएगा और भक्तों को शीघ्र फल प्रदान करेगा।
"नर्मदेश्वर महादेव"
काशी वाराणसी में स्थित अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिरों में एक श्री नर्मदेश्वर महादेव
साक्षात भगवान शिव का स्वरूप हैं, जो नर्मदा नदी के प्राकृतिक पत्थरों से बनते हैं। इनकी महिमा अपरंपार है और मान्यता है कि "नर्मदा का हर कंकर शंकर है"। यह दुनिया के एकमात्र ऐसे शिवलिंग हैं, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें किसी शिल्पकार द्वारा तराशा नहीं जाता, बल्कि ये माँ नर्मदा के जल प्रवाह में प्राकृतिक रूप से आकार लेते हैं। इसलिए ये स्वयंभू (स्वयं प्रकट) माने जाते हैं। शिव महापुराण के अनुसार, नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। चूँकि ये स्वयं सिद्ध होते हैं, इन्हें घर में स्थापित करने के लिए किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।
अन्य शिवलिंगों पर चढ़ाया गया प्रसाद या भोग ग्रहण नहीं किया जाता, लेकिन नर्मदेश्वर महादेव पर चढ़ाया गया प्रसाद बहुत पवित्र माना जाता है और इसे खाया जा सकता है। घर में इनकी पूजा करने से वास्तु दोष दूर होते हैं और साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों फलों की प्राप्ति होती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, माता नर्मदा ने ब्रह्मा जी से गंगा के समान पाप नाशिनी और मोक्षदायिनी बनने का वरदान मांगा था। बाद में भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि नर्मदा नदी से निकलने वाला हर पत्थर (बाणलिंग) नर्मदेश्वर के रूप में पूजा जाएगा और भक्तों को शीघ्र फल प्रदान करेगा।
"नर्मदेश्वर महादेव"
काशी वाराणसी में स्थित अत्यंत प्राचीन एवं ऐतिहासिक मंदिरों में एक श्री नर्मदेश्वर महादेव
साक्षात भगवान शिव का स्वरूप हैं, जो नर्मदा नदी के प्राकृतिक पत्थरों से बनते हैं। इनकी महिमा अपरंपार है और मान्यता है कि "नर्मदा का हर कंकर शंकर है"। यह दुनिया के एकमात्र ऐसे शिवलिंग हैं, जिनकी प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें किसी शिल्पकार द्वारा तराशा नहीं जाता, बल्कि ये माँ नर्मदा के जल प्रवाह में प्राकृतिक रूप से आकार लेते हैं। इसलिए ये स्वयंभू (स्वयं प्रकट) माने जाते हैं। शिव महापुराण के अनुसार, नर्मदा नदी के दर्शन मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। चूँकि ये स्वयं सिद्ध होते हैं, इन्हें घर में स्थापित करने के लिए किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।
अन्य शिवलिंगों पर चढ़ाया गया प्रसाद या भोग ग्रहण नहीं किया जाता, लेकिन नर्मदेश्वर महादेव पर चढ़ाया गया प्रसाद बहुत पवित्र माना जाता है और इसे खाया जा सकता है। घर में इनकी पूजा करने से वास्तु दोष दूर होते हैं और साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों फलों की प्राप्ति होती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, माता नर्मदा ने ब्रह्मा जी से गंगा के समान पाप नाशिनी और मोक्षदायिनी बनने का वरदान मांगा था। बाद में भगवान शिव ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि नर्मदा नदी से निकलने वाला हर पत्थर (बाणलिंग) नर्मदेश्वर के रूप में पूजा जाएगा और भक्तों को शीघ्र फल प्रदान करेगा।
