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साउथ के दिग्गज निर्देशक एसएस राजामौली अपनी मेगा बजट फिल्मों के लिए जाने जाते हैं। इन दिनों राजामौली अपनी वाराणसी फिल्म की वजह से सुर्खियों में हैं। यह भी एक मेगा बजट फिल्म है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस फिल्म का बजट करीब 1300 करोड़ रुपये है। यह भारत की दूसरी सबसे महंगी फिल्म है। इससे आगे सिर्फ रामायण है, जो लगभग 4000 करोड़ रुपये के बजट में बन रही है।
राजामौली की इस मेगा बजट फिल्म पर काम पिछले साल शुरू हुआ था। बीते साल महेश बाबू, प्रियंका चोपड़ा और फिल्म के अन्य कलाकारों ने भारत के बाद अफ्रीका में शूटिंग की थी। बता दें कि इस फिल्म में महेश बाबू मुख्य हीरो के किरदार में नजर आएंगे, जबकि विलेन के रोल में प्रियंका चोपड़ा दिखाई देंगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म की शूटिंग अभी तक पूरी नहीं हुई है। इसी बीच फिल्म को लेकर एक बड़ा अपडेट सामने आया है।
राजामौली वाराणसी फिल्म को एक खास दिन पर रिलीज करने की तैयारी कर रहे हैं। तेलुगु 123 की रिपोर्ट के मुताबिक, राजामौली इस फिल्म को साल 2027 में राम नवमी के मौके पर रिलीज करना चाहते हैं। उन्होंने 9 अप्रैल 2027 को फिल्म की रिलीज डेट तय की है। बहुत जल्द इसकी आधिकारिक घोषणा भी हो सकती है।
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देवरिया जिले से रिश्तों को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहां एक महिला अपने हाई स्कूल पास भांजे से इश्क लड़ा बैठी और उसे लेकर फरार हो गई।
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उत्तर प्रदेश के मेरठ की पहचान बन चुके पारंपरिक गजक को अब दुनिया भर में आधिकारिक पहचान मिल गई है। करीब 121 साल पुराने इस कारोबार को जियोग्राफिक इंडिकेशन (GI) टैग प्रदान किया गया है।
यह उपलब्धि मेरठ के कारीगरों, व्यापारियों और पीढ़ियों से इस मिठास को संजोए रखने वालों के लिए ऐतिहासिक मानी जा रही है।
मेरठ रेवड़ी गजक व्यापारी वेलफेयर एसोसिएशन के प्रयासों से यह सफलता मिली है। GI टैग मिलने के बाद अब गजक सिर्फ एक मिठाई नहीं, बल्कि मेरठ की सांस्कृतिक विरासत के रूप में वैश्विक मंच पर दर्ज हो गई है। इससे न सिर्फ नकली उत्पादों पर रोक लगेगी, बल्कि स्थानीय कारीगरों और व्यापारियों की आय में भी बढ़ोतरी होगी। अनुमान है कि इस कारोबार से 10 हजार से अधिक लोगों की आजीविका सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।
मेरठ की गजक की कहानी साल 1904 से शुरू होती है। गुदड़ी बाजार में लाला रामचंद्र की दुकान पर तिल और गुड़ के मेल से पहली बार यह अनोखा स्वाद सामने आया। एक छोटी-सी गलती से बने इस प्रयोग ने लोगों का दिल जीत लिया और धीरे-धीरे मेरठ की रेवड़ी और गजक पूरे देश में मशहूर हो गई। अंग्रेज अफसर तक इसके स्वाद के कायल थे। 1915 तक यह मिठाई अपने आज के स्वरूप में आ चुकी थी।
तिल और गुड़ से बनी गजक सिर्फ मिठाई नहीं, बल्कि सर्दियों में सेहत के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। इसमें इलायची, लौंग, जायफल और जावित्री जैसे मसाले मिलाए जाते हैं, जो ठंड के मौसम में शरीर को ऊर्जा देते हैं। नवरात्र से लेकर फरवरी तक इसकी मांग चरम पर रहती है।
जहां पहले केवल गुड़ की रेवड़ी और साधारण गजक मिलती थी, वहीं आज पट्टी गजक, स्प्रिंग रोल गजक, चॉकलेट रोल और ड्राई फ्रूट समोसा गजक जैसे नए रूप भी बाजार में उपलब्ध हैं। मेरठ की गजक अब 18 से अधिक देशों तक पहुंच चुकी है।
GI टैग के साथ मेरठ की यह मिठास अब सिर्फ ज़ुबान पर नहीं, बल्कि दुनिया के नक्शे पर भी अपनी पहचान दर्ज करा चुकी है एक ऐसा स्वाद, जो परंपरा, मेहनत और विरासत का प्रतीक है।
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