10 hrs - Translate

पूर्वांचल की धरती बलिया में जन्मे मंगल पांडे का नाम भारतीय स्वाधीनता संग्राम में अग्रणी योद्धाओं के रूप में लिया जाता है, उनके द्वारा भड़काई गई क्रांति की ज्वाला ने ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन बुरी तरह से हिला दिया था। ईस्ट इंडिया कंपनी, जोकि भार‍त में व्यापारियों के रूप में आई थी, उसने जब भारत को अपने अधीन कर लिया तो लंदन में बैठे उनके आकाओं ने शायद यह उम्मीद भी नहीं की होगी कि एक दिन मंगल पांडेय रूपी कोई तूफान ऐसी खलबली मचा देगा, जो इतिहास में भारत की आजादी की पहली लड़ाई कही जाएगी। सन् 1849 में मंगल पांडे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हुए और बैरकपुर की सैनिक छावनी में बंगाल नेटिव इन्फैंट्री यानी बीएनआई की 34वीं रेजीमेंट के पैदल सेना के सिपाही रहे।
मंगल पांडे के मन में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वार्थी नीतियों के कारण अंग्रेजी हुकुमत के प्रति पहले ही नफरत थी। जब सेना की बंगाल इकाई में ‘एनफील्ड पी.-53’ राइफल में नई कारतूसों का इस्तेमाल शुरू हुआ तो इन कारतूसों को बंदूक में डालने से पहले मुंह से खोलना पड़ता था। सैनिकों के बीच ऐसी खबर फैल गई कि इन कारतूसों को बनाने में गाय तथा सूअर की चर्बी का प्रयोग किया जाता है, जो कि हिन्दू और मुसलमानों दोनों के लिए गंभीर और धार्मिक विषय था। तब हिन्दू और मुसलमान दोनों धर्मों के सैनिकों के मन में अंग्रजों के खिलाफ आक्रोश पैदा हो गया।
इसके बाद 9 फरवरी 1857 को जब यह कारतूस देशी पैदल सेना को बांटा गया, तब मंगल पांडेय ने उसे न लेने को लेकर विद्रोह (Indian rebellion of 1857) जता दिया। इस बात से गुस्साए अंग्रेजी अफसर द्वारा मंगल पांडे से उनके हथियार छीन लेने और वर्दी उतरवाने का आदेश दिया, जिसे मानने से मंगल पांडे ने इनकार कर दिया। और रायफल छीनने आगे बढ़ रहे अंग्रेज अफसर मेजर ह्यूसन पर आक्रमण किया तथा उसे मौत के घाट उतार दिया, साथ ही उनके रास्ते में आए दूसरे एक और अंग्रेज अधिकारी लेफ्टिनेंट बॉब को भी मौत के घात उतार दिया।
इस तरह मंगल पांडेय ने बैरकपुर छावनी में 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया, अत: उन्हें आजादी की लड़ाई के अगदूत भी कहा जाता है। भारतीय इतिहास में इस घटना को ‘1857 का गदर’ नाम दिया गया।
इसके घटना के बाद मंगल पांडे को अंग्रेज सिपाहियों ने गिरफ्तार किया गया तथा उन पर कोर्ट मार्शल द्वारा मुकदमा चलाया और फांसी की सजा सुना दी गई। कोर्ट के फैसले के अनुसार उन्हें 18 अप्रैल 1857 को फांसी दी जानी थी, लेकि‍न अंग्रेजों द्वारा 10 दिन पूर्व ही यानी 8 अप्रैल सन् 1857 को ही मंगल पांडे को फांसी दे दी गई।
मंगल पांडे द्वारा किया गया यह विद्रोह ही भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा जा सकता है, जिसमें सैनिकों के साथ-साथ राजा-रजवाड़े, किसान, मजदूर एवं अन्य सभी सामान्य लोग भी शामिल हुए। अत: इस विद्रोह के बाद भारत पर राज्य करने का अंग्रेजों का सपना उन्हें कमजोर होता दिखाई दिया। मंगल पांडे आजादी के पहले ऐसे क्रांतिकारी थे, जिनके सामने गर्दन झुकाकर जल्‍लादों ने फांसी देने से इनकार कर दिया था।
अत: 1857 की आजादी के क्रांति के सबसे पहले नायक मंगल पांडे ही है, उस समय अंग्रेजों को फिरंगी के नाम से भी जाना जाता है और मंगल पांडे ने ही सबसे पहले 'मारो फिरंगी को' नारा दिया था।
भारत की स्वाधीनता की लड़ाई की अग्रदूत की जयंती पर कोटि-कोटि नमन।🙏💐

image
10 hrs - Translate

आजादी के दीवाने बुटेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेम्बली में शहीद भगत सिंह के साथ बम्ब रख कर आंदोलन को धार दी थी।पूण्य तिथि पर कोटि कोटि नमन , जय हिन्द ।
बटुकेश्वर दत्त
नाम याद है या भूल गए ?
हाँ,ये वही बटुकेश्वर दत्त हैं जिन्होंने भगतसिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था और गिरफ़्तारी भी दी थी,
भगत सिंह पर तो जुर्म संगीन थे लिहाज़ा उनको सजा-ए-मौत दी गयी पर बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी (अंडमान निकोबार) भेज दिया गया और मौत उनको करीब से छू कर गुज़र गयी ।।
वहाँ जेल में भयंकर टी.बी. हो जाने से मौत फिर एक बार बटुकेश्वर पर हावी हुई लेकिन वहाँ भी वो मौत को गच्चा दे गए ।।
कहते हैं जब भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव को फाँसी होने की खबर जेल में बटुकेश्वर को मिली तो वो बहुत उदास हो गए,इसलिए नहीं कि उनके दोस्तों को फाँसी की सज़ा हुई बल्कि इसलिए कि उनको अफसोस था कि उन्हें ही क्यों ज़िंदा छोड़ दिया गया !
1938 में उनकी रिहाई हुई और वो फिर से गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद पड़े लेकिन जल्द ही फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए और वो कई सालों तक जेल की यातनाएं झेलते रहे ।।
बहरहाल 1947 में देश आजाद हुआ और बटुकेश्वर को रिहाई मिली लेकिन इस वीर सपूत को वो दर्जा कभी ना मिला जो हमारी सरकार और भारतवासियों से उन्हें मिलना चाहिए था ।।
आज़ाद भारत में बटुकेश्वर नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगे,कभी बिस्किट बनाने का काम शुरू किया तो कभी टूरिस्ट गाइड का काम करके पेट पाला,लेकिन सब में असफल रहे ।।
एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे,उसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया,परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने इस 50 साल के अधेड़ की पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं,भगत के साथी की इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती भारत में ही संभव है ।।
हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी,1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया,लेकिन इसके बाद वो राजनीति की चकाचौंध से दूर गुमनामी में जीवन बिताते रहे,सरकार ने इनकी कोई सुध ना ली ।।
1964 में जीवन के अंतिम पड़ाव पर बटुकेश्वर दिल्ली के कैंसर से जूझ रहे थे तो उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज तक मुहैया नही करवाया जा रहा था तब उन्होंने अपने परिवार वालों से एक बात कही थी-
"जो दिल्ली बटुकेश्वर दत्त के नाम से कांपती थी,आज उसी दिल्ली के अस्पताल में उसे भर्ती तक नही किया जा रहा है ।"
इनकी दशा पर इनके मित्र चमनलाल ने एक लेख लिख कर देशवासियों का ध्यान इनकी ओर दिलाया कि-"किस तरह एक क्रांतिकारी जो फांसी से बाल-बाल बच गया जिसने कितने वर्ष देश के लिए कारावास भोगा,वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है ।।"
बताते हैं कि इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई,सरकार ने इन पर ध्यान देना शुरू किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।।
भगतसिंह की माँ भी अंतिम वक़्त में उनसे मिलने पहुँची।
भगतसिंह की माँ से उन्होंने सिर्फ एक बात कही-"मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत की समाधि के पास ही किया जाए ।।
इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई,17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया ।।
भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ ये गुमनाम शख्स आज भी सोया हुआ है ।।
मुझे लगता है भगत ने बटुकेश्वर से पूछा तो होगा- दोस्त मैं तो जीते जी आज़ाद भारत में सांस ले ना सका, तू बता आज़ादी के बाद हम क्रांतिकारियों की क्या शान है भारत में ।"
और क्या शान है आजाद भारत में क्रांतिकारियों की ये आप सभी देख ही रहे हैं ।
महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त जी की पुण्य तिथि पर उन्हें शत शत नमन 🙏🙏
तस्वीर में बटुकेश्वर दत्त अपने परिवार और भगत सिंह की माता जी के साथ

image
10 hrs - Translate

आजादी के दीवाने बुटेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेम्बली में शहीद भगत सिंह के साथ बम्ब रख कर आंदोलन को धार दी थी।पूण्य तिथि पर कोटि कोटि नमन , जय हिन्द ।
बटुकेश्वर दत्त
नाम याद है या भूल गए ?
हाँ,ये वही बटुकेश्वर दत्त हैं जिन्होंने भगतसिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था और गिरफ़्तारी भी दी थी,
भगत सिंह पर तो जुर्म संगीन थे लिहाज़ा उनको सजा-ए-मौत दी गयी पर बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी (अंडमान निकोबार) भेज दिया गया और मौत उनको करीब से छू कर गुज़र गयी ।।
वहाँ जेल में भयंकर टी.बी. हो जाने से मौत फिर एक बार बटुकेश्वर पर हावी हुई लेकिन वहाँ भी वो मौत को गच्चा दे गए ।।
कहते हैं जब भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव को फाँसी होने की खबर जेल में बटुकेश्वर को मिली तो वो बहुत उदास हो गए,इसलिए नहीं कि उनके दोस्तों को फाँसी की सज़ा हुई बल्कि इसलिए कि उनको अफसोस था कि उन्हें ही क्यों ज़िंदा छोड़ दिया गया !
1938 में उनकी रिहाई हुई और वो फिर से गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद पड़े लेकिन जल्द ही फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए और वो कई सालों तक जेल की यातनाएं झेलते रहे ।।
बहरहाल 1947 में देश आजाद हुआ और बटुकेश्वर को रिहाई मिली लेकिन इस वीर सपूत को वो दर्जा कभी ना मिला जो हमारी सरकार और भारतवासियों से उन्हें मिलना चाहिए था ।।
आज़ाद भारत में बटुकेश्वर नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगे,कभी बिस्किट बनाने का काम शुरू किया तो कभी टूरिस्ट गाइड का काम करके पेट पाला,लेकिन सब में असफल रहे ।।
एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे,उसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया,परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने इस 50 साल के अधेड़ की पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं,भगत के साथी की इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती भारत में ही संभव है ।।
हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी,1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया,लेकिन इसके बाद वो राजनीति की चकाचौंध से दूर गुमनामी में जीवन बिताते रहे,सरकार ने इनकी कोई सुध ना ली ।।
1964 में जीवन के अंतिम पड़ाव पर बटुकेश्वर दिल्ली के कैंसर से जूझ रहे थे तो उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज तक मुहैया नही करवाया जा रहा था तब उन्होंने अपने परिवार वालों से एक बात कही थी-
"जो दिल्ली बटुकेश्वर दत्त के नाम से कांपती थी,आज उसी दिल्ली के अस्पताल में उसे भर्ती तक नही किया जा रहा है ।"
इनकी दशा पर इनके मित्र चमनलाल ने एक लेख लिख कर देशवासियों का ध्यान इनकी ओर दिलाया कि-"किस तरह एक क्रांतिकारी जो फांसी से बाल-बाल बच गया जिसने कितने वर्ष देश के लिए कारावास भोगा,वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है ।।"
बताते हैं कि इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई,सरकार ने इन पर ध्यान देना शुरू किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।।
भगतसिंह की माँ भी अंतिम वक़्त में उनसे मिलने पहुँची।
भगतसिंह की माँ से उन्होंने सिर्फ एक बात कही-"मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत की समाधि के पास ही किया जाए ।।
इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई,17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया ।।
भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ ये गुमनाम शख्स आज भी सोया हुआ है ।।
मुझे लगता है भगत ने बटुकेश्वर से पूछा तो होगा- दोस्त मैं तो जीते जी आज़ाद भारत में सांस ले ना सका, तू बता आज़ादी के बाद हम क्रांतिकारियों की क्या शान है भारत में ।"
और क्या शान है आजाद भारत में क्रांतिकारियों की ये आप सभी देख ही रहे हैं ।
महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त जी की पुण्य तिथि पर उन्हें शत शत नमन 🙏🙏
तस्वीर में बटुकेश्वर दत्त अपने परिवार और भगत सिंह की माता जी के साथ

image
10 hrs - Translate

आजादी के दीवाने बुटेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेम्बली में शहीद भगत सिंह के साथ बम्ब रख कर आंदोलन को धार दी थी।पूण्य तिथि पर कोटि कोटि नमन , जय हिन्द ।
बटुकेश्वर दत्त
नाम याद है या भूल गए ?
हाँ,ये वही बटुकेश्वर दत्त हैं जिन्होंने भगतसिंह के साथ दिल्ली असेंबली में बम फेंका था और गिरफ़्तारी भी दी थी,
भगत सिंह पर तो जुर्म संगीन थे लिहाज़ा उनको सजा-ए-मौत दी गयी पर बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास के लिए काला पानी (अंडमान निकोबार) भेज दिया गया और मौत उनको करीब से छू कर गुज़र गयी ।।
वहाँ जेल में भयंकर टी.बी. हो जाने से मौत फिर एक बार बटुकेश्वर पर हावी हुई लेकिन वहाँ भी वो मौत को गच्चा दे गए ।।
कहते हैं जब भगतसिंह, राजगुरु सुखदेव को फाँसी होने की खबर जेल में बटुकेश्वर को मिली तो वो बहुत उदास हो गए,इसलिए नहीं कि उनके दोस्तों को फाँसी की सज़ा हुई बल्कि इसलिए कि उनको अफसोस था कि उन्हें ही क्यों ज़िंदा छोड़ दिया गया !
1938 में उनकी रिहाई हुई और वो फिर से गांधी जी के साथ आंदोलन में कूद पड़े लेकिन जल्द ही फिर से गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए और वो कई सालों तक जेल की यातनाएं झेलते रहे ।।
बहरहाल 1947 में देश आजाद हुआ और बटुकेश्वर को रिहाई मिली लेकिन इस वीर सपूत को वो दर्जा कभी ना मिला जो हमारी सरकार और भारतवासियों से उन्हें मिलना चाहिए था ।।
आज़ाद भारत में बटुकेश्वर नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगे,कभी बिस्किट बनाने का काम शुरू किया तो कभी टूरिस्ट गाइड का काम करके पेट पाला,लेकिन सब में असफल रहे ।।
एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे,उसके लिए बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया,परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने इस 50 साल के अधेड़ की पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं,भगत के साथी की इतनी बड़ी बेइज़्ज़ती भारत में ही संभव है ।।
हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफ़ी मांगी थी,1963 में उन्हें विधान परिषद का सदस्य बना दिया गया,लेकिन इसके बाद वो राजनीति की चकाचौंध से दूर गुमनामी में जीवन बिताते रहे,सरकार ने इनकी कोई सुध ना ली ।।
1964 में जीवन के अंतिम पड़ाव पर बटुकेश्वर दिल्ली के कैंसर से जूझ रहे थे तो उन्हें सरकारी अस्पतालों में इलाज तक मुहैया नही करवाया जा रहा था तब उन्होंने अपने परिवार वालों से एक बात कही थी-
"जो दिल्ली बटुकेश्वर दत्त के नाम से कांपती थी,आज उसी दिल्ली के अस्पताल में उसे भर्ती तक नही किया जा रहा है ।"
इनकी दशा पर इनके मित्र चमनलाल ने एक लेख लिख कर देशवासियों का ध्यान इनकी ओर दिलाया कि-"किस तरह एक क्रांतिकारी जो फांसी से बाल-बाल बच गया जिसने कितने वर्ष देश के लिए कारावास भोगा,वह आज नितांत दयनीय स्थिति में अस्पताल में पड़ा एड़ियां रगड़ रहा है और उसे कोई पूछने वाला नहीं है ।।"
बताते हैं कि इस लेख के बाद सत्ता के गलियारों में थोड़ी हलचल हुई,सरकार ने इन पर ध्यान देना शुरू किया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी ।।
भगतसिंह की माँ भी अंतिम वक़्त में उनसे मिलने पहुँची।
भगतसिंह की माँ से उन्होंने सिर्फ एक बात कही-"मेरी इच्छा है कि मेरा अंतिम संस्कार भगत की समाधि के पास ही किया जाए ।।
इसके बाद उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई,17 जुलाई को वे कोमा में चले गये और 20 जुलाई 1965 की रात एक बजकर 50 मिनट पर उनका देहांत हो गया ।।
भारत पाकिस्तान सीमा के पास पंजाब के हुसैनीवाला स्थान पर भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु की समाधि के साथ ये गुमनाम शख्स आज भी सोया हुआ है ।।
मुझे लगता है भगत ने बटुकेश्वर से पूछा तो होगा- दोस्त मैं तो जीते जी आज़ाद भारत में सांस ले ना सका, तू बता आज़ादी के बाद हम क्रांतिकारियों की क्या शान है भारत में ।"
और क्या शान है आजाद भारत में क्रांतिकारियों की ये आप सभी देख ही रहे हैं ।
महान क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त जी की पुण्य तिथि पर उन्हें शत शत नमन 🙏🙏
तस्वीर में बटुकेश्वर दत्त अपने परिवार और भगत सिंह की माता जी के साथ

imageimage
10 hrs - Translate

Muskaan Power Infrastructure Ltd" is highly recognized for its high-quality range of Compact / Power Substation Transformers.
CONTACT NOW FOR BETTER DEALS -
+91 9915703061
EMAIL: INFOmuskaan power.COM
WEBSITE:WWW.MUSKAANPOWER.COM
#cementplant #tubemills #rollingmills #ricemills #flourmills #riceshellers #foodprocessin****its #transformers #ricemills #voltagecontrolle

image

भारत के दिग्गज पहलवान और मिश्रित मार्शल आर्ट खिलाड़ी संग्राम सिंह ने पाकिस्तान के मोहम्मद आबिद अली को महज एक मिनट 20 सेकंड में नॉकआउट करते हुए ’स्ट्राइक एशिया’ चैंपियनशिप का खिताब अपने नाम कर लिया।

image

घुनी नं. 2, कठघरिया (हल्द्वानी) में भारतीय जनता पार्टी जिला नैनीताल किसान मोर्चा के जिलाध्यक्ष श्री गणेश शाह जी की पूजनीय माताजी के त्रिमासिक वार्षिक श्राद्ध में पहुंचकर उनके चित्र पर श्रद्धासुमन अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।

image

राष्ट्रभक्ति के अमर प्रतीक एवं महान स्वतंत्रता सेनानी बटुकेश्वर दत्त जी की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
माँ भारती की स्वतंत्रता हेतु उनका अतुलनीय समर्पण, संघर्ष एवं बलिदान राष्ट्रसेवा का अमूल्य पाथेय है।

image

ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਡੋਨਾਲਡ ਟਰੰਪ ਨੇ FIFA World Cup ਦੇ Champions ਸਪੇਨ ਨੂੰ ਸੌਂਪੀ ਟਰਾਫੀ
#fifaworldcup2026 #uspresident #donaldtrump #worldcuptrophy #spain #latestnews #dailypostpunjabi

image

ਰਾਸ਼ਟਰਪਤੀ ਡੋਨਾਲਡ ਟਰੰਪ ਨੇ FIFA World Cup ਦੇ Champions ਸਪੇਨ ਨੂੰ ਸੌਂਪੀ ਟਰਾਫੀ
#fifaworldcup2026 #uspresident #donaldtrump #worldcuptrophy #spain #latestnews #dailypostpunjabi

image