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Muskaan Power Infrastructure Ltd" is highly recognized for its high-quality range of Compact / Power Substation Transformers.
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WEBSITE:WWW.MUSKAANPOWER.COM
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🙏🎬 जिस फिल्म को कभी ठुकराया गया, आज उसी की सफलता की चर्चा हो रही है!
नीम करौली बाबा से प्रेरित फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने अपनी कथित बड़ी सफलता से सबका ध्यान खींचा है। फिल्म की कमाई ₹360 करोड़ से ज्यादा पहुंचने का दावा किया जा रहा है। खास बात यह है कि शुरुआत में कई बड़े प्रोडक्शन हाउस और OTT प्लेटफॉर्म्स ने इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।
फिल्म की को-प्रोड्यूसर अनुप्रिया नागर के मुताबिक, अब कुछ बड़े मेकर्स खुद फोन कर रहे हैं और कह रहे हैं कि उस समय फिल्म को ना कहना उनकी बड़ी भूल थी।
इस कहानी के पीछे करीब 14 साल का संघर्ष भी है। डायरेक्टर विशाल चतुर्वेदी लंबे समय तक इस प्रोजेक्ट के लिए प्रोड्यूसर्स और बड़े बैनर्स से संपर्क करते रहे, लेकिन उन्हें आसानी से मौका नहीं मिला।
करीब ₹1.5 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म की कथित कमाई ने एक बार फिर यह चर्चा छेड़ दी है कि किसी फिल्म की सफलता सिर्फ बड़े बजट या बड़े सितारों से तय नहीं होती। अगर कहानी दर्शकों को पसंद आ जाए और उनसे जुड़ जाए, तो छोटा प्रोजेक्ट भी बड़ी पहचान बना सकता है।
14 साल तक इंतजार करने वाली कहानी आज करोड़ों की कमाई के दावे तक पहुंच गई—यही वक्त का बदलाव है। 🙏❤️
अब सवाल यही है—क्या फिल्म इंडस्ट्री को ऐसी नई और छोटी फिल्मों को शुरुआत से ही ज्यादा मौके देने चाहिए? कमेंट में अपनी राय जरूर बताइए।
भारत अब 350 किमी/घंटा की रफ्तार वाली स्वदेशी ट्रेन बनाने की तैयारी में!
भारत 2030 तक B35 नाम से हाई-स्पीड ट्रेन विकसित करने की योजना पर काम कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, B35 की डिजाइन स्पीड 350 किमी/घंटा होगी, जो जापान की अगली पीढ़ी की E10 सीरीज के बराबर स्पीड श्रेणी में होगी।
वहीं, इससे पहले भारत की B28 ट्रेन का 2027 में परीक्षण प्रस्तावित है, जिसकी डिजाइन स्पीड 280 किमी/घंटा बताई गई है।
जापान की E10 सीरीज का उत्पादन 2030 में शुरू होने और 2034 तक संचालन के लिए तैयार होने की उम्मीद है। ऐसे में भारत भी अपनी हाई-स्पीड रेल तकनीक को आगे बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।
280 किमी/घंटा से 350 किमी/घंटा तक… भारत की रेल रफ्तार अब एक नई ऊंचाई की ओर!
राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया की प्रेम कहानी बॉलीवुड के सबसे चर्चित रिश्तों में गिनी जाती है। एक तरफ 70 के दशक के सुपरस्टार राजेश खन्ना थे, जिनकी एक झलक के लिए लाखों प्रशंसक दीवाने रहते थे, तो दूसरी ओर डिंपल कपाड़िया थीं, जिन्होंने महज 16 साल की उम्र में बॉबी से फिल्मी दुनिया में कदम रखकर रातोंरात स्टारडम हासिल कर लिया।
राजेश खन्ना ने आराधना, आनंद, अमर प्रेम, कटी पतंग जैसी फिल्मों से हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। वहीं डिंपल ने बॉबी के बाद सागर, रुदाली और क्रांतिवीर जैसी फिल्मों में अपने दमदार अभिनय से साबित किया कि वह सिर्फ एक खूबसूरत चेहरा नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनेत्री भी हैं।
साल 1973 में राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया ने शादी कर ली। उस समय दोनों की उम्र में करीब 15 साल का अंतर था और यह शादी फिल्म इंडस्ट्री में काफी चर्चा का विषय बनी। दोनों की दो बेटियां हैं—ट्विंकल खन्ना और रिंकी खन्ना।
समय के साथ उनके रिश्ते में कई उतार-चढ़ाव आए और दोनों लंबे समय तक अलग रहे, लेकिन उनके बीच का जुड़ाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। राजेश खन्ना के आखिरी वर्षों में भी डिंपल उनके साथ नजर आईं।
दो अलग दौर के इन सितारों की कहानी आज भी बॉलीवुड की उन यादगार कहानियों में शामिल है, जिसे लोग लंबे समय तक याद करते रहेंगे।
₹6.75 की सिरिंज पर ₹57.20 की MRP, ₹11.05 के IV सेट पर ₹325!
महाराष्ट्र FDA के सर्वे में अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले कुछ मेडिकल सामान की खरीद कीमत और MRP में बड़ा अंतर सामने आया है। FDA कमिश्नर और IAS अधिकारी तुकाराम मुंढे ने इस मामले को सामने रखते हुए मेडिकल कंज्यूमेबल्स की कीमतों में पारदर्शिता और नियमन की जरूरत पर सवाल उठाए हैं।
FDA के मुताबिक, एक सिरिंज ₹6.75 में खरीदी गई, लेकिन उसकी MRP ₹57.20 थी। वहीं ₹11.05 की ट्रेड कीमत वाले IV इन्फ्यूजन सेट पर ₹325 की MRP दर्ज मिली।
महाराष्ट्र FDA ने अपने निष्कर्ष National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) को भेजे हैं और कीमतों के नियमन को लेकर दिशा-निर्देशों पर विचार करने का अनुरोध किया है।
हालांकि, खरीद कीमत और MRP के इस अंतर को सीधे अस्पताल का मुनाफा कहना सही नहीं होगा, क्योंकि इसमें निर्माण, सप्लाई, वितरण और दूसरे खर्च भी शामिल हो सकते हैं।
💬 इलाज के दौरान इस्तेमाल होने वाले मेडिकल सामान की कीमतों में पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए—आपकी क्या राय है?
कभी पढ़ाई के लिए साबुन और चश्मे बेचे, आज 37 हजार से ज्यादा बच्चों की जिंदगी बदल चुके हैं!
वाराणसी के डॉ. सुबोध कुमार सिंह की कहानी संघर्ष और सेवा की ऐसी मिसाल है, जो लंबे समय तक याद रहती है।
पिता के निधन के बाद परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी उनके सामने थी। पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्होंने मुश्किल हालात में साबुन और चश्मे तक बेचे, लेकिन परिस्थितियों को अपनी पढ़ाई के आड़े नहीं आने दिया। मेहनत के दम पर डॉक्टर बने और बाद में उन्होंने जरूरतमंद बच्चों के इलाज को अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा बना लिया।
पिछले 21 वर्षों में डॉ. सुबोध कुमार सिंह 37 हजार से ज्यादा बच्चों की मुफ्त सर्जरी कर चुके हैं। वे खास तौर पर कटे होंठ और तालू की समस्या से जूझ रहे बच्चों का इलाज करते हैं। इस सेवा से न सिर्फ बच्चों को इलाज मिला, बल्कि उनके परिवारों को भी एक नई उम्मीद मिली।
कभी अपनी पढ़ाई के लिए संघर्ष करने वाले डॉ. सुबोध आज उन परिवारों के लिए सहारा बने हैं, जो अपने बच्चों के इलाज का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होते।
उनकी कहानी इसलिए खास है क्योंकि उन्होंने अपनी मुश्किलों को सिर्फ याद नहीं रखा, बल्कि उन्हीं मुश्किलों से निकली समझ को दूसरों की मदद में लगा दिया। ❤️🙏
संघर्ष से निकलकर दूसरों के लिए उम्मीद बन जाना ही शायद सफलता का सबसे खूबसूरत रूप है।