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📰 दूध पीते ही सो जाता था पति, फिर पत्नी पर लगे गंभीर आरोप! एक पति ने आरोप लगाया कि चाय, दूध और खाने में नींद की दवा मिलाई जाती थी। उसके मुताबिक, घर में एक युवक के आने-जाने को लेकर पत्नी को आपत्तिजनक हालत में पकड़ा गया। पति ने प्रेमी से सिंदूर भरवाने और मांगे हुए सिंदूर से उसे स्वीकार करने का भी आर...
उत्तरप्रदेश के नोएडा में घटी इस घटना ने पूरे सभ्य समाज को झकझोर के रख दिया है इस घटना मै शादी हुई
शादी के बाद एक बच्चा पैदा हुआ।
बच्चा जन्म से ही बीमार था।
बाप ने उसका इलाज करवाने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
लाखों खर्च हो गए, लेकिन बच्चा ठीक नहीं हुआ।
फिर भी बाप ने हार नहीं मानी।
क्योंकि बाप ऐसे हार नहीं मानते।
उसने अपनी हैसियत से आगे जाकर कोशिश की।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसका बच्चा सामान्य जिंदगी जी पाएगा।
लेकिन हालात ने करवट ली।
उस औरत ने देखा कि आदमी की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है, मानसिक रूप से भी वह टूट चुका है और अब देने के लिए शायद कुछ बचा नहीं है।
तो उसने सोचा—
क्यों न इससे भी उगाही कर ली जाए और फिर बाजार में कोई नया 'मुर्गा' तलाश लिया जाए।
बीमार बच्चे को बाप से अलग कर दिया गया।
और फिर कानून के बाजार में कीमत तय हुई
तीन करोड़।
थोड़ा-बहुत वह हताश पिता देता भी रहा।
लेकिन शायद किसी ने यह नहीं पूछा कि
जिस आदमी ने अपने बच्चे के इलाज के लिए अपना सब कुछ लगा दिया,
उसके पास अब बचा क्या है?
उसे लगा
यह कैसा परिवार है, जहां परिवार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले का बचा हुआ खून भी निचोड़ लिया जाता है?
और यह कैसा कानून है,
जो उसकी परिस्थितियों को समझने के बजाय सिर्फ किस्तें तय करता है
"इतना भरो। फिर इतना भरो। फिर इतना और भरो।"
शायद एक दिन उस आदमी को लगा कि
यह दुनिया उसके लिए नहीं है।
और उसने दुनिया ही छोड़ दी।
लेकिन ध्यान रखिए
उसने तब हार नहीं मानी थी जब उसके बच्चे के जन्म से पहले ही उसके बीमार होने की खबर मिली थी।
उसने तब भी हार नहीं मानी जब लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चा ठीक नहीं हुआ।
वह तब भी लड़ता रहता।
अगर उसके साथ कोई खड़ा रहता।
अगर उसे मानसिक सहारा मिलता।
अगर कोई उससे सिर्फ इतना कह देता—
"तुम अकेले नहीं हो। हम साथ हैं।"
तो शायद वह आदमी आखिरी सांस तक लड़ता।
क्योंकि पिता हार नहीं मानते।
पिता कर्ज लेते हैं।
भीख मांगते हैं।
अपना घर बेच देते हैं।
खुद भूखे रह लेते हैं।
लेकिन अपने बच्चे के लिए लड़ना नहीं छोड़ते।
मगर उस दिन सिर्फ एक जान नहीं गई।
एक पिता मरा।
और एक बच्चा भी उसी दिन अनाथ हो गया भले उसका पिता जिंदा न रहा हो।
वह बच्चा शायद किसी दिन चुपचाप उस औरत द्वारा निपटा दिया जाएगा क्योंकि अब उस बच्चे को माध्यम बना कर उगाही नहीं हो सकती
और शायद यही इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा है।
उत्तरप्रदेश के नोएडा में घटी इस घटना ने पूरे सभ्य समाज को झकझोर के रख दिया है इस घटना मै शादी हुई
शादी के बाद एक बच्चा पैदा हुआ।
बच्चा जन्म से ही बीमार था।
बाप ने उसका इलाज करवाने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
लाखों खर्च हो गए, लेकिन बच्चा ठीक नहीं हुआ।
फिर भी बाप ने हार नहीं मानी।
क्योंकि बाप ऐसे हार नहीं मानते।
उसने अपनी हैसियत से आगे जाकर कोशिश की।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसका बच्चा सामान्य जिंदगी जी पाएगा।
लेकिन हालात ने करवट ली।
उस औरत ने देखा कि आदमी की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है, मानसिक रूप से भी वह टूट चुका है और अब देने के लिए शायद कुछ बचा नहीं है।
तो उसने सोचा—
क्यों न इससे भी उगाही कर ली जाए और फिर बाजार में कोई नया 'मुर्गा' तलाश लिया जाए।
बीमार बच्चे को बाप से अलग कर दिया गया।
और फिर कानून के बाजार में कीमत तय हुई
तीन करोड़।
थोड़ा-बहुत वह हताश पिता देता भी रहा।
लेकिन शायद किसी ने यह नहीं पूछा कि
जिस आदमी ने अपने बच्चे के इलाज के लिए अपना सब कुछ लगा दिया,
उसके पास अब बचा क्या है?
उसे लगा
यह कैसा परिवार है, जहां परिवार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले का बचा हुआ खून भी निचोड़ लिया जाता है?
और यह कैसा कानून है,
जो उसकी परिस्थितियों को समझने के बजाय सिर्फ किस्तें तय करता है
"इतना भरो। फिर इतना भरो। फिर इतना और भरो।"
शायद एक दिन उस आदमी को लगा कि
यह दुनिया उसके लिए नहीं है।
और उसने दुनिया ही छोड़ दी।
लेकिन ध्यान रखिए
उसने तब हार नहीं मानी थी जब उसके बच्चे के जन्म से पहले ही उसके बीमार होने की खबर मिली थी।
उसने तब भी हार नहीं मानी जब लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चा ठीक नहीं हुआ।
वह तब भी लड़ता रहता।
अगर उसके साथ कोई खड़ा रहता।
अगर उसे मानसिक सहारा मिलता।
अगर कोई उससे सिर्फ इतना कह देता—
"तुम अकेले नहीं हो। हम साथ हैं।"
तो शायद वह आदमी आखिरी सांस तक लड़ता।
क्योंकि पिता हार नहीं मानते।
पिता कर्ज लेते हैं।
भीख मांगते हैं।
अपना घर बेच देते हैं।
खुद भूखे रह लेते हैं।
लेकिन अपने बच्चे के लिए लड़ना नहीं छोड़ते।
मगर उस दिन सिर्फ एक जान नहीं गई।
एक पिता मरा।
और एक बच्चा भी उसी दिन अनाथ हो गया भले उसका पिता जिंदा न रहा हो।
वह बच्चा शायद किसी दिन चुपचाप उस औरत द्वारा निपटा दिया जाएगा क्योंकि अब उस बच्चे को माध्यम बना कर उगाही नहीं हो सकती
और शायद यही इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा है।
उत्तरप्रदेश के नोएडा में घटी इस घटना ने पूरे सभ्य समाज को झकझोर के रख दिया है इस घटना मै शादी हुई
शादी के बाद एक बच्चा पैदा हुआ।
बच्चा जन्म से ही बीमार था।
बाप ने उसका इलाज करवाने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
लाखों खर्च हो गए, लेकिन बच्चा ठीक नहीं हुआ।
फिर भी बाप ने हार नहीं मानी।
क्योंकि बाप ऐसे हार नहीं मानते।
उसने अपनी हैसियत से आगे जाकर कोशिश की।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसका बच्चा सामान्य जिंदगी जी पाएगा।
लेकिन हालात ने करवट ली।
उस औरत ने देखा कि आदमी की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है, मानसिक रूप से भी वह टूट चुका है और अब देने के लिए शायद कुछ बचा नहीं है।
तो उसने सोचा—
क्यों न इससे भी उगाही कर ली जाए और फिर बाजार में कोई नया 'मुर्गा' तलाश लिया जाए।
बीमार बच्चे को बाप से अलग कर दिया गया।
और फिर कानून के बाजार में कीमत तय हुई
तीन करोड़।
थोड़ा-बहुत वह हताश पिता देता भी रहा।
लेकिन शायद किसी ने यह नहीं पूछा कि
जिस आदमी ने अपने बच्चे के इलाज के लिए अपना सब कुछ लगा दिया,
उसके पास अब बचा क्या है?
उसे लगा
यह कैसा परिवार है, जहां परिवार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले का बचा हुआ खून भी निचोड़ लिया जाता है?
और यह कैसा कानून है,
जो उसकी परिस्थितियों को समझने के बजाय सिर्फ किस्तें तय करता है
"इतना भरो। फिर इतना भरो। फिर इतना और भरो।"
शायद एक दिन उस आदमी को लगा कि
यह दुनिया उसके लिए नहीं है।
और उसने दुनिया ही छोड़ दी।
लेकिन ध्यान रखिए
उसने तब हार नहीं मानी थी जब उसके बच्चे के जन्म से पहले ही उसके बीमार होने की खबर मिली थी।
उसने तब भी हार नहीं मानी जब लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चा ठीक नहीं हुआ।
वह तब भी लड़ता रहता।
अगर उसके साथ कोई खड़ा रहता।
अगर उसे मानसिक सहारा मिलता।
अगर कोई उससे सिर्फ इतना कह देता—
"तुम अकेले नहीं हो। हम साथ हैं।"
तो शायद वह आदमी आखिरी सांस तक लड़ता।
क्योंकि पिता हार नहीं मानते।
पिता कर्ज लेते हैं।
भीख मांगते हैं।
अपना घर बेच देते हैं।
खुद भूखे रह लेते हैं।
लेकिन अपने बच्चे के लिए लड़ना नहीं छोड़ते।
मगर उस दिन सिर्फ एक जान नहीं गई।
एक पिता मरा।
और एक बच्चा भी उसी दिन अनाथ हो गया भले उसका पिता जिंदा न रहा हो।
वह बच्चा शायद किसी दिन चुपचाप उस औरत द्वारा निपटा दिया जाएगा क्योंकि अब उस बच्चे को माध्यम बना कर उगाही नहीं हो सकती
और शायद यही इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा है।
उत्तरप्रदेश के नोएडा में घटी इस घटना ने पूरे सभ्य समाज को झकझोर के रख दिया है इस घटना मै शादी हुई
शादी के बाद एक बच्चा पैदा हुआ।
बच्चा जन्म से ही बीमार था।
बाप ने उसका इलाज करवाने में अपनी जमा-पूंजी लगा दी।
लाखों खर्च हो गए, लेकिन बच्चा ठीक नहीं हुआ।
फिर भी बाप ने हार नहीं मानी।
क्योंकि बाप ऐसे हार नहीं मानते।
उसने अपनी हैसियत से आगे जाकर कोशिश की।
उसे उम्मीद थी कि एक दिन उसका बच्चा सामान्य जिंदगी जी पाएगा।
लेकिन हालात ने करवट ली।
उस औरत ने देखा कि आदमी की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है, मानसिक रूप से भी वह टूट चुका है और अब देने के लिए शायद कुछ बचा नहीं है।
तो उसने सोचा—
क्यों न इससे भी उगाही कर ली जाए और फिर बाजार में कोई नया 'मुर्गा' तलाश लिया जाए।
बीमार बच्चे को बाप से अलग कर दिया गया।
और फिर कानून के बाजार में कीमत तय हुई
तीन करोड़।
थोड़ा-बहुत वह हताश पिता देता भी रहा।
लेकिन शायद किसी ने यह नहीं पूछा कि
जिस आदमी ने अपने बच्चे के इलाज के लिए अपना सब कुछ लगा दिया,
उसके पास अब बचा क्या है?
उसे लगा
यह कैसा परिवार है, जहां परिवार के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने वाले का बचा हुआ खून भी निचोड़ लिया जाता है?
और यह कैसा कानून है,
जो उसकी परिस्थितियों को समझने के बजाय सिर्फ किस्तें तय करता है
"इतना भरो। फिर इतना भरो। फिर इतना और भरो।"
शायद एक दिन उस आदमी को लगा कि
यह दुनिया उसके लिए नहीं है।
और उसने दुनिया ही छोड़ दी।
लेकिन ध्यान रखिए
उसने तब हार नहीं मानी थी जब उसके बच्चे के जन्म से पहले ही उसके बीमार होने की खबर मिली थी।
उसने तब भी हार नहीं मानी जब लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी बच्चा ठीक नहीं हुआ।
वह तब भी लड़ता रहता।
अगर उसके साथ कोई खड़ा रहता।
अगर उसे मानसिक सहारा मिलता।
अगर कोई उससे सिर्फ इतना कह देता—
"तुम अकेले नहीं हो। हम साथ हैं।"
तो शायद वह आदमी आखिरी सांस तक लड़ता।
क्योंकि पिता हार नहीं मानते।
पिता कर्ज लेते हैं।
भीख मांगते हैं।
अपना घर बेच देते हैं।
खुद भूखे रह लेते हैं।
लेकिन अपने बच्चे के लिए लड़ना नहीं छोड़ते।
मगर उस दिन सिर्फ एक जान नहीं गई।
एक पिता मरा।
और एक बच्चा भी उसी दिन अनाथ हो गया भले उसका पिता जिंदा न रहा हो।
वह बच्चा शायद किसी दिन चुपचाप उस औरत द्वारा निपटा दिया जाएगा क्योंकि अब उस बच्चे को माध्यम बना कर उगाही नहीं हो सकती
और शायद यही इस कहानी का सबसे भयावह हिस्सा है।


