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राजपूत समाज के गौरव, श्री राजपूत करणी सेना के संस्थापक,
सामाजिक न्याय और स्वाभिमान की बुलंद आवाज़ उठाने वाले महान व्यक्तित्व
स्वर्गीय ठाकुर लोकेन्द्र सिंह कालवी जी की द्वितीय पुण्यतिथि पर
कोटि-कोटि नमन एवं भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏🌺
आपने अपने पूरे जीवन को राजपूत समाज के सम्मान, स्वाभिमान और अधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया।
जब-जब समाज के सम्मान पर आंच आई, तब-तब आपने एक सच्चे योद्धा की तरह आगे बढ़कर समाज का नेतृत्व किया।
आपके साहस, त्याग और संघर्ष की गाथा सदैव इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाएगी।
आपने केवल एक संगठन की स्थापना नहीं की, बल्कि समाज को एकजुट करने का महान कार्य किया।
श्री राजपूत करणी सेना के माध्यम से आपने लाखों युवाओं में आत्मसम्मान, एकता और अपने इतिहास के प्रति गर्व की भावना जगाई।
आपका संघर्ष हमें यह सिखाता है कि जब समाज के सम्मान की बात हो, तब हर व्यक्ति को एकजुट होकर खड़ा होना चाहिए।
आज भले ही आप हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आपके विचार, आपका साहस और समाज के लिए आपका समर्पण हमेशा हमें प्रेरणा देता रहेगा।
आपके दिखाए हुए मार्ग पर चलकर ही समाज और राष्ट्र की सेवा करना ही आपके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
ईश्वर से प्रार्थना है कि आपकी पुण्य आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और हमें आपके आदर्शों पर चलने की शक्ति प्रदान करें।
महामानव के श्री चरणों में शत-शत नमन। 🙏🚩
🙏 यदि आप भी ठाकुर लोकेन्द्र सिंह कालवी जी को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और कमेंट में “जय राजपूताना” अवश्य लिखें।
ताकि पूरे भारत को पता चले कि समाज आज भी अपने महान नेता को याद करता है।
✍️ अंकित सिंह सनातनी ✍️
जय राजपूताना 🚩
जय श्री राम 🚩
#lokendrasinghkalvi
#rajputsamaj

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भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में प्रातःकाल भ्रमण के दौरान भारतीय सेना के सेवानिवृत्त सैनिक श्री मेहरबान सिंह जी के प्रतिष्ठान पर चाय की चुस्कियों का आनंद लिया, इस दौरान उन्होंने भेंट स्वरूप घर पर बने स्वादिष्ट अरसे भी दिए। इस अवसर पर वहां उपस्थित स्थानीय नागरिकों से आत्मीय संवाद कर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित विभिन्न विकासपरक एवं जनकल्याणकारी योजनाओं का फीडबैक लिया।
जनता से सीधे संवाद का यह माध्यम सदैव हमें और अधिक समर्पण के साथ कार्य करने की प्रेरणा देता है।

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भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में प्रातःकाल भ्रमण के दौरान भारतीय सेना के सेवानिवृत्त सैनिक श्री मेहरबान सिंह जी के प्रतिष्ठान पर चाय की चुस्कियों का आनंद लिया, इस दौरान उन्होंने भेंट स्वरूप घर पर बने स्वादिष्ट अरसे भी दिए। इस अवसर पर वहां उपस्थित स्थानीय नागरिकों से आत्मीय संवाद कर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित विभिन्न विकासपरक एवं जनकल्याणकारी योजनाओं का फीडबैक लिया।
जनता से सीधे संवाद का यह माध्यम सदैव हमें और अधिक समर्पण के साथ कार्य करने की प्रेरणा देता है।

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भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में प्रातःकाल भ्रमण के दौरान भारतीय सेना के सेवानिवृत्त सैनिक श्री मेहरबान सिंह जी के प्रतिष्ठान पर चाय की चुस्कियों का आनंद लिया, इस दौरान उन्होंने भेंट स्वरूप घर पर बने स्वादिष्ट अरसे भी दिए। इस अवसर पर वहां उपस्थित स्थानीय नागरिकों से आत्मीय संवाद कर प्रदेश सरकार द्वारा संचालित विभिन्न विकासपरक एवं जनकल्याणकारी योजनाओं का फीडबैक लिया।
जनता से सीधे संवाद का यह माध्यम सदैव हमें और अधिक समर्पण के साथ कार्य करने की प्रेरणा देता है।

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मराठा साम्राज्य के कुशल कूटनीतिज्ञ, कुशल प्रशासक ब्रिटिश शासन के कठिन दौर में मराठा साम्राज्य की कीर्ति को उसकी बुलन्दियों पर पहुंचाने वाले दूरदर्शी मंत्री नाना फडणवीस (12 फरवरी 1742 – 13 मार्च 180 जी की पुण्यतिथि पर उन्हें शतशः नमन!
उनके राजनीतिक चातुर्य के कारण अंग्रेज उन्हें “मराठा मैकियावेली” कहते थे। उनका वास्तविक नाम बालाजी जनार्दन भानु था। उनका जन्म सतारा, महाराष्ट्र में एक चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध के बाद, जब मराठा शक्ति बिखर गई थी, तब नाना फड़नवीस ने साम्राज्य को पुनर्गठित करने और उसकी प्रतिष्ठा वापस दिलाने में मुख्य भूमिका निभाई।
पेशवा नारायण राव की हत्या के बाद, उन्होंने 'बार भाई' (12 सदस्यों की परिषद) का गठन किया, जिसने नवजात पेशवा माधवराव द्वितीय के नाम पर शासन चलाया और रघुनाथराव के सत्ता हथियाने के प्रयासों को विफल कर दिया।उन्होंने मराठा हितों की रक्षा के लिए अंग्रेजों (ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी) की विस्तारवादी नीतियों का कड़ा विरोध किया और पहले आंग्ल-मराठा युद्ध में कुशल कूटनीति का परिचय दिया।उन्होंने मैसूर के टीपू सुल्तान और हैदराबाद के निजाम के खिलाफ सफल सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया और मराठा क्षेत्रों को पुनः प्राप्त किया।नाना ने एक मजबूत खुफिया विभाग और केंद्रीकृत राजस्व प्रणाली की स्थापना की थी।
नाना फड़नवीस की मृत्यु (13 मार्च 180 को मराठा साम्राज्य के पतन की शुरुआत माना जाता है, क्योंकि उनके बाद कोई भी ऐसा नेता नहीं बचा जो बिखरे हुए मराठा सरदारों को एकजुट रख सके।
उनकी नीति, बुद्धिमत्ता और राष्ट्रभक्ति आने वाली पीढ़ियों को मार्गदर्शन देती रहेगी।
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