मुंशी प्रेमचंद : गरीबी में पली महानता की अमर कहानी
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के वो स्तंभ थे, जिनकी कलम ने भूख, गरीबी, अन्याय और इंसानियत की आवाज़ को शब्द दिए। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था, पर दुनिया ने उन्हें प्रेमचंद के नाम से जाना—और आज भी उसी नाम से सम्मान दिया जाता है।
प्रेमचंद जितने महान लेखक थे, उतने ही गरीब इंसान भी थे। जीवन भर उन्होंने दूसरों के दुःख लिखे, लेकिन अपने दुःख कभी शब्दों में नहीं ढाले। कई बार ऐसा हुआ कि घर में रात का भोजन नहीं होता था, इलाज के लिए पैसे नहीं होते थे, फिर भी उनकी कलम कभी रुकी नहीं।
✒️ एक सच्ची घटना
जब प्रेमचंद हंस पत्रिका के संपादक थे, तब वे अक्सर दूसरे लेखकों को अपनी जेब से पैसे दे देते थे, जबकि खुद कर्ज़ में डूबे रहते थे।
एक दिन उनकी पत्नी शिवरानी देवी ने उनसे पूछा—
“जब हमारे पास खुद कुछ नहीं है, तो आप दूसरों की इतनी मदद क्यों करते हैं?”
प्रेमचंद ने शांत स्वर में उत्तर दिया—
“अगर मेरी कहानियाँ भूख और अन्याय पर लिखी जाती हैं,
और मैं किसी भूखे लेखक को लौटा दूँ,
तो मेरी कलम झूठी हो जाएगी।”
यही वाक्य उनके पूरे जीवन का सार है।
🕯️ गरीबी में अंतिम सांस
सन् 1936 में मुंशी प्रेमचंद का निधन हो गया।
ना इलाज के लिए पर्याप्त पैसे थे,
ना आराम के साधन,
ना वैभव।
जिस व्यक्ति ने गोदान, कफ़न, निर्मला जैसी अमर रचनाएँ दीं—
वह कर्ज़ और अभाव में इस दुनिया से चला गया।
🌼 सच्ची महानता
प्रेमचंद ने यह सिद्ध कर दिया कि—
“महानता धन से नहीं,
दूसरों के दुःख को समझने की क्षमता से आती है।”
वे धन में गरीब थे,
लेकिन मानवता में अपार धनी।
आज भी उनकी कहानियाँ
किसानों की पीड़ा बोलती हैं,
गरीबों की भूख बताती हैं,
और समाज को आईना दिखाती हैं।
मुंशी प्रेमचंद मर सकते हैं,
पर उनकी कलम—
कभी नहीं।


