जब तुलसीदास जी काशी (वाराणसी) में रहकर रामचरितमानस लिख रहे थे, तब उसकी लोकप्रियता और बढ़ते प्रभाव को देखकर कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने उस पवित्र ग्रंथ को चुराने या नष्ट करने की योजना बनाई। उन्होंने दो चोरों को रात के समय तुलसीदास जी की कुटिया में चोरी करने के लिए भेजा।
पहरेदार और चोरों का हृदय परिवर्तन
अद्भुत पहरेदार: जब चोर तुलसीदास जी के घर पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि कुटिया के बाहर दो अत्यंत सुंदर और तेजस्वी राजकुमार हाथ में धनुष-बाण लिए पहरा दे रहे हैं। उनके तेज को देखकर चोर डर गए और वापस लौट गए।
चोरों की जिज्ञासा: चोरों ने अगली रात फिर प्रयास किया, लेकिन उन्हें फिर से वही दो धनुर्धारी पहरेदार वहां मिले। ऐसा लगातार कई रातों तक हुआ। अंत में चोरों के मन में यह जानने की व्याकुलता हुई कि आखिर ये रक्षक कौन हैं।
सत्य का ज्ञान: अगले दिन सुबह वे चोर तुलसीदास जी के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि, "बाबा! वे दो सांवले और गोरे रंग के धनुर्धारी युवक कौन हैं जो रात भर आपकी कुटिया के बाहर पहरा देते हैं?"
तुलसीदास जी की प्रतिक्रिया
जब तुलसीदास जी ने यह सुना, तो वे फूट-फूट कर रोने लगे। वे समझ गए कि स्वयं भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी उनके तुच्छ घर की और उनकी रचना की रक्षा के लिए रात भर जागकर पहरा दे रहे थे।
तुलसीदास जी को बहुत आत्मग्लानि हुई कि उनके कारण उनके प्रभु को इतना कष्ट उठाना पड़ा। कहते हैं कि इसके बाद उन्होंने अपनी कुटिया का सारा सामान दान कर दिया और केवल प्रभु के चरणों में ध्यान लगाया। वहीं, उन दोनों चोरों का हृदय परिवर्तन हो गया, उन्होंने चोरी छोड़ दी और प्रभु के भक्त बन गए।
यह प्रसंग तुलसीदास जी की अनन्य भक्ति और भगवान की अपने भक्त के प्रति वत्सलता का अनुपम उदाहरण माना जाता है। इस प्रसंग का वर्णन भक्तमाल और तुलसीदास जी के जीवन चरित्र में प्रमुखता से मिलता है।

