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1998 की एक ठंडी सुबह। आइसलैंड का इलेक्ट्रीशियन फ़ेलिक्स बिजली की एक लाइन ठीक करने गया था। गलती से उसने चालू तार पकड़ लिया। 11,000 वोल्ट का झटका लगा और वो 30 फीट नीचे जमी ज़मीन पर जा गिरा। जान तो बच गई, पर दोनों हाथ हमेशा के लिए चले गए। तब उसकी उम्र सिर्फ 26 साल थी।
नकली हाथ लगे, पर दिल में एक ही सपना था: असली हाथ। 2007 में एक होटल में उसकी मुलाकात दुनिया के पहले हाथ ट्रांसप्लांट करने वाले डॉक्टर से हुई। फ़ेलिक्स ने सीधा पूछ लिया, "क्या मुझे दोनों हाथ मिल सकते हैं?"
वो फ्रांस के लियों शहर आ गया और सालों इंतज़ार करता रहा। वहीं उसे अपनी पत्नी सिल्विया भी मिली।
13 जनवरी 2021। 15 घंटे का ऑपरेशन। दुनिया में पहली बार किसी को दोनों हाथ और कंधे ट्रांसप्लांट किए गए।
आज भी रिकवरी जारी है, पर 23 साल बाद फ़ेलिक्स अपने नाती-पोतों को गले लगा पाया।
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एक वक्त था जब हर साल हज़ारों बच्चे पोलियो की वजह से हमेशा के लिए अपने पैरों पर चलने से रह जाते थे। किसी माँ की गोद में बैठा हँसता बच्चा एक बुखार के बाद फिर कभी खड़ा नहीं हो पाता था।
फिर देश ने ठान लिया। 1995 में पल्स पोलियो अभियान शुरू हुआ, और गली-गली, गाँव-गाँव "दो बूँद ज़िंदगी की" पहुँची। स्वास्थ्यकर्मी धूप, बारिश और दूरी की परवाह किए बिना हर दरवाज़े तक गए।
और 2014 में भारत को पोलियो-मुक्त घोषित किया गया। 🇮🇳
पर जंग अभी खत्म नहीं हुई। दुनिया के कुछ हिस्सों में यह वायरस अब भी मौजूद है, इसलिए हर बच्चे का टीका ज़रूरी है।
आज विश्व पोलियो दिवस पर पक्का कीजिए कि आपके घर और आसपास का कोई बच्चा टीके से छूटे नहीं। 💉
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दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने आँख की रेटिना को दोबारा बनाने की दिशा में बड़ी कामयाबी हासिल की है। KAIST संस्थान की टीम ने PROX1 नाम के प्रोटीन की पहचान की है, जो चोट के बाद रेटिना को खुद की मरम्मत करने से रोकता है।
शोधकर्ताओं ने एंटीबॉडी की मदद से इस प्रोटीन को रोका। रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा वाले चूहों पर किए गए प्रयोग में रेटिना दोबारा बनने लगी और नज़र छह महीने से ज़्यादा लौटी रही। 👁️
यह शोध नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में छपा है। अभी यह इलाज सिर्फ चूहों पर आज़माया गया है। इंसानों पर क्लिनिकल ट्रायल 2028 तक शुरू होने की उम्मीद है।
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