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हादसे में दोनों हाथ गंवाए, फिर किसी और के हाथों से मिली नई जिंदगी
कभी-कभी जिंदगी एक पल में पूरी तरह बदल जाती है।
सितंबर 2016 में 18 साल की श्रेया सिद्धनागौडर पुणे से अपने कॉलेज लौट रही थीं। रास्ते में उनकी बस का भयानक एक्सीडेंट हो गया। हादसा इतना गंभीर था कि श्रेया के दोनों हाथ बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।
डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन आखिरकार उनकी जान बचाने के लिए दोनों हाथों को कोहनी के नीचे से काटना पड़ा।
सिर्फ 18 साल की उम्र में श्रेया की जिंदगी पूरी तरह बदल गई।
जो काम पहले कुछ सेकंड में हो जाते थे, अब उनके लिए बड़ी चुनौती बन चुके थे। लिखना, खाना, कपड़े पहनना और रोजमर्रा के छोटे-छोटे काम भी मुश्किल हो गए।
लेकिन श्रेया ने हार नहीं मानी।
लगभग एक साल बाद उन्हें एक ऐसी खबर मिली, जिसने उनकी जिंदगी में फिर उम्मीद जगा दी।
केरल के कोच्चि स्थित अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में डॉक्टरों को एक उपयुक्त हाथों का डोनर मिल गया था।
डोनर 20 वर्षीय सचिन नाम का युवक था, जो एक मोटरसाइकिल दुर्घटना के बाद ब्रेन-डेड घोषित किया गया था। सचिन के परिवार ने अंगदान का फैसला लिया और उनके हाथ श्रेया को ट्रांसप्लांट किए गए।
9 अगस्त 2017 को डॉक्टरों की एक बड़ी टीम ने करीब 13 घंटे तक चली बेहद जटिल सर्जरी में श्रेया के दोनों हाथों का ट्रांसप्लांट किया।
इस ऑपरेशन में 20 सर्जन और 16 एनेस्थीसिया विशेषज्ञ शामिल थे।
यह सर्जरी इसलिए भी ऐतिहासिक मानी गई क्योंकि अमृता अस्पताल के अनुसार यह दुनिया का पहला documented male-to-female hand transplant था।
लेकिन ऑपरेशन के बाद असली चुनौती शुरू हुई।
नए हाथ मिलने के बाद श्रेया को महीनों तक लगातार रिहैबिलिटेशन और फिजियोथेरेपी करनी पड़ी। उन्हें दोबारा हाथों की मूवमेंट और संवेदना विकसित करने के लिए घंटों अभ्यास करना पड़ता था।
शुरुआत में ट्रांसप्लांट किए गए हाथ उनके अपने हाथों की तुलना में ज्यादा गहरे रंग के और भारी दिखाई देते थे।
लेकिन समय के साथ एक हैरान करने वाला बदलाव देखने को मिला।
लगभग 18 महीनों के दौरान हाथों का आकार धीरे-धीरे कम हुआ और उनका रंग भी श्रेया की त्वचा के ज्यादा करीब दिखाई देने लगा। डॉक्टरों ने इसके पीछे शरीर के जैविक बदलावों और मेलानिन जैसे कई संभावित कारणों पर चर्चा की, हालांकि इसका सटीक कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं माना गया।
लेकिन श्रेया की कहानी सिर्फ एक मेडिकल उपलब्धि बनकर नहीं रह गई।
उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी, आगे बढ़ीं और अपने भविष्य के लिए नए लक्ष्य बनाए।
जिस हादसे ने उनकी जिंदगी को एक पल में बदल दिया था, वह उनके सपनों का अंत नहीं बन सका।
इस कहानी के पीछे एक और परिवार की कुर्बानी भी है—सचिन का परिवार।
अपने बेटे को खोने के बेहद मुश्किल समय में उन्होंने अंगदान का फैसला लिया। उनके इस फैसले की वजह से किसी दूसरे इंसान को अपनी जिंदगी दोबारा आगे बढ़ाने का मौका मिला।
जागरूकता
अंगदान के बारे में सही जानकारी हासिल करना बेहद जरूरी है।
किसी व्यक्ति के जाने के बाद उसके अंग और ऊतक दूसरे जरूरतमंद लोगों के लिए जीवन बदलने का माध्यम बन सकते हैं।
श्रेया की कहानी हमें यह भी दिखाती है कि मेडिकल साइंस सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं करता, बल्कि कई बार किसी इंसान को दोबारा अपने पैरों पर खड़े होने और अपने सपनों की तरफ लौटने का अवसर देता है।
एक हादसे ने श्रेया से उनके दोनों हाथ छीन लिए थे।
लेकिन एक परिवार के अंगदान, डॉक्टरों की मेहनत और श्रेया के हौसले ने उन्हें फिर से जिंदगी को अपने हाथों से छूने का मौका दिया।
किसी की जिंदगी खत्म होने के बाद भी, अंगदान के जरिए उसकी अच्छाई किसी और की जिंदगी में आगे बढ़ सकती है। See less
— feeling blessed at
😳 क्या जुड़वां बच्चों के पिता अलग हो सकते हैं?
नॉटिंघम, ब्रिटेन में 2022 में जन्मे Ayon और Azirah अपनी अलग-अलग त्वचा के रंग और आंखों के कारण चर्चा में आए थे। Ayon की त्वचा हल्की और आंखें हरी थीं, जबकि Azirah की त्वचा गहरी और आंखें भूरी थीं। उनकी मां Chantelle Broughton ने बताया था कि लोग अक्सर दोनों को देखकर हैरान हो जाते थे।
लेकिन यहां एक जरूरी फैक्ट समझना चाहिए—सिर्फ अलग रंग या आंखों के आधार पर यह साबित नहीं होता कि जुड़वां बच्चों के पिता अलग हैं।
हालांकि विज्ञान में ऐसी घटना वास्तव में संभव है। इसे Heteropaternal Superfecundation कहा जाता है। इसमें एक ही मासिक चक्र के दौरान महिला के दो अलग-अलग अंडे अलग-अलग पुरुषों के शुक्राणुओं से निषेचित हो सकते हैं। इससे पैदा होने वाले बच्चे जुड़वां होते हैं, लेकिन उनके जैविक पिता अलग हो सकते हैं।
ऐसे मामलों की पुष्टि DNA परीक्षण से की जा सकती है। वैज्ञानिक साहित्य में अलग-अलग जैविक पिताओं वाले जुड़वां बच्चों के प्रमाणित मामले दर्ज हैं।
यानी एक ही मां, एक ही गर्भावस्था और एक ही जन्मदिन—लेकिन असाधारण परिस्थितियों में दो अलग जैविक पिता होना संभव है।
⚠️ जागरूकता
बच्चों के रंग, आंखों या चेहरे में अंतर देखकर उनके माता-पिता या रिश्तों के बारे में निष्कर्ष निकालना सही नहीं है। आनुवंशिक समानता बहुत जटिल होती है और भाई-बहनों में भी काफी शारीरिक अंतर हो सकता है।
फैक्ट चेक करें, शक या अफवाह पर भरोसा न करें। ❤️ See less
— feeling blessed at Indore (M.P.).