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पंजाब में अपनों के विदेश जाने और काम में व्यस्त होने के कारण उपजा 'अकेलापन' अब एक सामाजिक संकट और नया बिजनेस बन गया है। जालंधर, अमृतसर और लुधियाना जैसे शहरों में अब ऐसी कंपनियां उभर रही हैं जो फीस के बदले बुजुर्गों को 'किराये की संतान' यानी अटेंडेंट मुहैया कराती हैं। ये अटेंडेंट केवल केयरटेकर नहीं, बल्कि दोस्तों की तरह बुजुर्गों के साथ लूडो खेलते हैं, अखबार पढ़कर सुनाते हैं और उनके पुराने किस्से सुनते हैं। जालंधर में ही ऐसी 40 कंपनियां और करीब 750 अटेंडेंट इस इकोसिस्टम का हिस्सा बन चुके हैं, जो 1000 रुपये प्रतिदिन की दर पर सेवाएं दे रहे हैं। यह हकीकत दिखाती है कि आलीशान कोठियों के भीतर बुजुर्गों का एकांत कितना गहरा है, जहाँ अब खून के रिश्तों की जगह 'प्रोफेशनल अपनेपन' ने सहारा लेना शुरू कर दिया है।

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बागेश्वर। आज के समय में जहां रिश्तों में दूरियां तथा बिखराव आम हो गए हैं, वहीं कपकोट तहसील के फरसाली वल्ली तिलघर गांव निवासी 89 वर्षीय पूर्व सैनिक केदार सिंह कोश्यारी ने सच्चे प्रेम की ऐसी मिसाल पेश की है, जो हर किसी को भावुक कर देती है।
उन्होंने अपनी दिवंगत पत्नी की याद को जीवित रखने के लिए उनकी आदमकद मूर्ति बनवाकर उसे अपने घर में स्थापित किया है तथा आज भी उसी समर्पण के साथ उनका साथ निभा रहे हैं।
पूर्व सैनिक केदार सिंह का विवाह वर्ष 1955 में लक्ष्मी देवी के साथ हुआ था। दोनों का दांपत्य जीवन प्रेम, विश्वास तथा सामंजस्य से भरा रहा।
सेना में रहते हुए भी केदार सिंह ने परिवार और रिश्तों को बराबर महत्व दिया, लेकिन पारिवारिक कारणों से उन्हें समय से पहले सेवा छोड़कर गांव लौटना पड़ा।
सात दिसंबर 2019 को एक विवाह समारोह के दौरान लक्ष्मी देवी का अचानक निधन हो गया। 57 वर्षों का साथ एक झटके में टूट गया। संतान न होने के कारण केदार सिंह पूरी तरह अकेले पड़ गए।
हालांकि, उनके भतीजे और पुत्रवधू उनकी देखभाल करते हैं, लेकिन जीवनसंगिनी के जाने का खालीपन उन्हें हर पल महसूस होता रहा।
केदार सिंह का यह समर्पण पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग उनके इस निस्वार्थ प्रेम को सच्चे प्रेम की अनूठी मिसाल मान रहे हैं।
जहां आज के दौर में रिश्ते अक्सर समय और परिस्थितियों के साथ बदल जाते हैं, वहीं केदार सिंह की यह कहानी बताती है कि सच्चा प्रेम केवल जीवन तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह यादों और समर्पण में हमेशा जीवित रहता है।

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ਪੰਜਾਬ 'ਚ ਰੇਲਵੇ ਟਰੈਕ ਨੂੰ ਉਡਾਉਣ ਦੀ ਸਾਜਿਸ਼ ! ਦਿੱਲੀ-ਰਾਜਪੁਰਾ ਰੇਲਵੇ ਟਰੈਕ 'ਤੇ ਜ਼ੋਰਦਾਰ ਧਮਾਕਾ
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बेंगलुरु CET परीक्षा में बवाल, जनेऊ उतरवाने के आरोप, 3 प्रोफेसर सस्पेंड
बेंगलुरु में CET परीक्षा के दौरान बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि 5 ब्राह्मण छात्रों को जबरन जनेऊ उतारने के लिए कहा गया।
माता-पिता की शिकायत के बाद पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है और मामले ने तूल पकड़ लिया है।
इस पूरे विवाद पर कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री एम.सी. सुधाकर ने कहा कि मामले को गंभीरता से लिया गया है और अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए हैं।
कार्रवाई करते हुए 3 प्रोफेसरों को सस्पेंड भी कर दिया गया है।
अब सवाल बड़ा है…
क्या यह नियमों का पालन था या धार्मिक स्वतंत्रता पर चोट?

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अनार से ज्यादा महंगा उसका छिलका होता है जानते हैं। अनार के एक छिलके को उतार कर रोस्ट कर लेना है। जब कलर ब्लैक होने लगे तो, 2 चम्मच कलौंजी डालें, इसको भी अच्छे से रोस्ट कर लें, इन दोनों को पीसकर एक पाउडर बना लें। इसमें एक चम्मच आंवला पाउडर, जरूरत के अनुसार सरसों का तेल डालकर पेस्ट बना ले, आपका ब्लैक हेयर कलर डाई तैयार है।

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Om sai namo namah ❤️❤️

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किसी पर भरोसा ना करें...
अपने बच्चों का स्वयं ध्यान रखें...
दिलरोज कौर से मिलिए। ये ढाई साल की छोटी मासूम बच्ची थी। अपने मां-बाप और दादा-दादी की आंखों की प्यारी। लुधियाना के शिमलापुरी की गलियों में उसकी खिलखिलाहट गूंजती थी, लेकिन 28 नवंबर 2021 की उस मनहूस दोपहर को एक ऐसा साया मंडराया जिसने इस मासूमियत को हमेशा के लिए मिट्टी में दफन कर दिया ।
उस दिन दोपहर के करीब 2:15 बजे थे। दिलरोज अपनी दादी हरविंदर कौर के साथ घर के बाहर खेल रही थी । दादी बस दो मिनट के लिए पानी पीने अंदर गईं और जब वापस आईं, तो दिलरोज गायब थी। सीसीटीवी फुटेज में जो दिखा, उसने सबका दिल दहला दिया। पड़ोस में रहने वाली नीलम, जिसे दिलरोज 'बुआ' कहकर बुलाती थी, उसे अपनी एक्टिवा पर बिठाकर ले जा रही थी ।
हैरानी की बात यह थी कि मासूम दिलरोज स्कूटी पर आगे खड़ी होकर बहुत खुश दिख रही थी। उसे लग रहा था कि 'बुआ' उसे सैर कराने या कुछ खिलाने ले जा रही है । उसे क्या पता था कि जिस पर वह इतना भरोसा कर रही है, वही उसकी मौत की इबारत लिख चुकी है।
नीलम उस बच्ची को करीब 13 किलोमीटर दूर जालंधर जीटी रोड पर एक सुनसान प्लॉट पर ले गई । वहां उसने पहले से ही एक गड्ढा खोद रखा था, जो बताता है कि यह कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी ।
क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए, नीलम ने मासूम दिलरोज के मुंह और नाक में जबरन रेत भर दी ताकि वह चिल्ला न सके और फिर उसे उस गड्ढे में उल्टा करके जिंदा दफना दिया । मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, रेत बच्ची के फेफड़ों तक पहुंच गई थी, जिससे दम घुटने (Asphyxiation) के कारण कुछ ही सेकंड में उसकी मौत हो गई।
पुलिस जांच और अदालत की कार्यवाही में जो सच सामने आया, वह समाज की कड़वी हकीकत बयां करता है। नीलम एक तलाकशुदा महिला थी और उसके अपने दो बच्चे थे । वह दिलरोज के परिवार की खुशहाली और उनके बच्चों को मिलने वाली सुख-सुविधाओं से जलती थी ।
दिलरोज के पिता हरप्रीत सिंह पंजाब पुलिस में थे । परिवार ने नीलम के व्यवहार को देखते हुए अपनी बहू को उससे बात करने से मना किया था । इसी सामाजिक तिरस्कार और हीन भावना ने नीलम के अंदर ऐसी नफरत भर दी कि उसने मासूम बच्ची से बदला लेने की ठान ली
अप्रैल 2024 में लुधियाना की सत्र अदालत ने इस मामले को "दुर्लभतम से दुर्लभ" (Rarest of Rare) करार दिया । जज मुनीश सिंघल ने फैसला सुनाते हुए कहा कि एक मासूम बच्ची को जिंदा दफन करना न केवल क्रूर है, बल्कि यह मानवता के खिलाफ अपराध है ।
अदालत ने नीलम को मृत्युदंड (फांसी की सजा) सुनाई। फैसला सुनते ही कोर्ट परिसर में मौजूद दिलरोज के माता-पिता की आंखों से आंसू छलक पड़े, जिन्हें ढाई साल के लंबे इंतजार के बाद न्याय मिला था l
हालांकि सत्र अदालत ने फांसी की सजा सुना दी है, लेकिन भारतीय कानून के अनुसार इसे पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय से पुष्टि मिलना अनिवार्य है । समाज आज भी उस दिन का इंतजार कर रहा है जब दिलरोज की रूह को पूरी तरह शांति मिलेगी। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि हमारे आसपास छिपी ईर्ष्या और नफरत कितनी खतरनाक हो सकती है।

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