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विद्या भारती के स्तम्भ लज्जाराम तोमर
भारत में लाखों सरकारी एवं निजी विद्यालय हैं; पर शासकीय सहायता के बिना स्थानीय हिन्दू जनता के सहयोग एवं विश्वास के बल पर काम करने वाली संस्था ‘विद्या भारती’ सबसे बड़ी शिक्षा संस्था है। इसे देशव्यापी बनाने में जिनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा, वे थे 21 जुलाई, 1930 को गांव वघपुरा (मुरैना, म.प्र.) में जन्मे श्री लज्जाराम तोमर।
लज्जाराम जी के परिवार की उस क्षेत्र में अत्यधिक प्रतिष्ठा थी। मेधावी छात्र होने के कारण सभी परीक्षाएं उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद उन्होंने 1957 में एम.ए तथा बी.एड किया। उनकी अधिकांश शिक्षा आगरा में हुई। 1945 में वे संघ के सम्पर्क में आयेे। उस समय उ.प्र. के प्रांत प्रचारक थे श्री भाउराव देवरस। अपनी पारखी दृष्टि से वे लोगों को तुरंत पहचान जाते थे। लज्जाराम जी पर भी उनकी दृष्टि थी। अब तक वे आगरा में एक इंटर कालिज में प्राध्यापक हो चुके थे। उनकी गृहस्थी भी भली प्रकार चल रही थी।
लज्जाराम जी इंटर कालिज में और उच्च पद पर पहुंच सकते थे; पर भाउराव के आग्रह पर वे सरकारी नौकरी छोड़कर सरस्वती शिशु मंदिर योजना में आ गये। यहां शिक्षा संबंधी उनकी कल्पनाओं के पूरा होने के भरपूर अवसर थे। उन्होंने अनेक नये प्रयोग किये, जिसकी ओर विद्या भारती के साथ ही अन्य सरकारी व निजी विद्यालयों के प्राचार्य तथा प्रबंधक भी आकृष्ट हुए। आपातकाल के विरोध में उन्होंने जेल यात्रा भी की।

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ये दीपके भी सपने में ज्ञाभन है

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20 जुलाई को प्रदर्शन करने वाले सभी कॉकरोचों से विनती है पिछवाड़े पर रुई बांधकर जाना, दिल्ली पुलिस आपकी सेवा में सारी रात अपने रामलाल को तेल पिलाने में लगी है ।

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बलि का बकरा ही चोरी हो गया 😂😂😂😂

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😜 पूरे देश की यही पुकार 😜
🤣पिछवाड़ा लाल करे सरकार 🤣

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जहाँ एक तरफ दुनियाभर में FIFA का क्रेज छाया है, वहीं दूसरी तरफ 12 साल का भारतीय फुटबॉलर वांगशेम कोन्याक स्वीडन के Gothia Cup 2026 में अपनी हैट्रिक से तहलका मचा रहा है और ब्राजील जैसी मजबूत टीम को हराकर तिरंगे का मान बढ़ा रहा है।
यह कहानी नागालैंड के एक सुदूर और छोटे से गांव तन्हाई (मोन जिला) से निकले एक बच्चे की है, जिसने बेहद छोटी उम्र से ही बुनियादी सुविधाओं की कमी के बावजूद देश के लिए फुटबॉल खेलने का सपना पाल रखा था।
संघर्ष सिर्फ इस नन्हे खिलाड़ी का नहीं, बल्कि उसके माता-पिता का भी था। जब खेलने के लिए अच्छे मैदान और सीखने के लिए गांव में कोई कोचिंग इंस्टीट्यूट नहीं थे, तब पिता पोंगशिंग कोन्याक ने बेटे की असाधारण प्रतिभा को पहचाना।
एक माता-पिता के लिए अपने कलेजे के टुकड़े को सिर्फ 9 साल की उम्र में खुद से सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब की मिनर्वा अकादमी भेजना आसान नहीं था। लेकिन यह फैसला एक बच्चे के सपनों को उड़ान देने के लिए था।
पिता का वो त्याग, पूरे गांव की दुआएं और वांगशेम की दिन-रात की मेहनत आख़िरकार रंग लाई। आज उसी छोटे से गांव का वांगशेम यूरोप की धरती पर स्वीडन के गोथिया कप 2026 में अपनी हैट्रिक से तहलका मचा रहा है और ब्राजील जैसी मजबूत टीम को हराकर भारत का तिरंगा गर्व से लहरा रहा है।
यह कहानी साबित करती है कि अगर इरादे मजबूत हों और परिवार का साथ हो, तो आप अपनी किस्मत खुद लिख सकते हैं। वांगशेम की उड़ान पर पूरे देश को गर्व है! 🇮🇳✨
#wangshemkonyak #inspiration #nagalandpride #indianfootball #gothiacup2026

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