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यह है असली उदासी…
ग्लैमर के लिए लोग एक्ट्रेसेज़ का जश्न मनाते हैं… लेकिन जब आर. माधवन के बेटे ने भारत के लिए गोल्ड मेडल जीता, तो देश में उसकी चर्चा तक नहीं हुई। 🇮🇳🥇
जिस लड़के ने देश का नाम रोशन किया, वह सुर्खियों का हक़दार है — चुप्पी का नहीं।
टैलेंट, अनुशासन और राष्ट्रीय गौरव
मेकअप, फैशन या रेड-कार्पेट की चमक से ज़्यादा मायने रखने चाहिए…
पर अफसोस, दुनिया आज ऐसी नहीं है।
जब किसी एक्टर का बेटा
शोहरत की चाह छोड़कर मेहनत चुनता है,
स्टारडम के बजाय स्पोर्ट्स को अपनाता है,
तो उसे और ज़ोरदार तरीके से सेलिब्रेट किया जाना चाहिए।
क्योंकि ऐसी जीतें भारत का तिरंगा ऊँचा करती हैं —
ना कि सिर्फ ट्रेंडिंग हैशटैग।
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In Germany, leaf plates—known there as “eco-friendly plates”—are now sold at a high price. People consider them a modern and sustainable alternative to plastic.
Interestingly, India has been using pattal for centuries during festivals and community meals. What was once seen as a traditional or outdated practice is now being praised worldwide.
The world is finally realizing that India’s old habits were actually powerful environmental solutions. #fblifestyle
कुछ कहानियाँ फ़िल्मों से भी ज़्यादा खूबसूरत होती हैं… ✨
1988 में दिल्ली के एक थिएटर की अँधेरी सीटों के नीचे एक 10 दिन की घायल बच्ची मिली… चूहों और कीड़ों से जख्मी, बिलकुल अकेली… 💔
लेकिन किस्मत ने उसके लिए एक मसीहा भेजा था—प्रकाश झा।
उन्होंने न सिर्फ उसे गोद लिया, बल्कि इतना प्यार दिया कि आज वही बच्ची दिशा झा के नाम से एक सफल प्रोड्यूसर बन चुकी है। 🌟
कहते हैं, रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं…
और इस कहानी में वो दिल, वो इंसानियत और वो प्यार—सब कुछ है। ❤️
🙏 सलाम ऐसे माता-पिता को, जो सिर्फ नाम नहीं, किसी की पूरी ज़िंदगी बदल देते हैं…
#fblifestyle
कानपुर के रामा देवी फ्लाईओवर पर दिल्ली से बनारस जा रही एक स्लीपर बस में अचानक आग लग गई. बस में 35-40 यात्री सवार थे, जो समय रहते नीचे उतर गए और बड़ा हादसा टल गया. आग कुछ ही मिनटों में इतनी बढ़ी कि पूरी बस जलकर खाक हो गई. फायर ब्रिगेड ने आग बुझाई और पुलिस ने यात्रियों को दूसरी बस से बनारस रवाना किया.
पूरी खबर :https://shorturl.at/QsaNp
#uttarpradesh #kanpur #ramdeviflyover #delhitobanaras #fire
आरक्षण नहीं, ये तो राजा का मुकुट बन गया है! 👑
क्या आरक्षण सचमुच 'आरक्षण' रह गया है, या यह 'राजा का मुकुट' बन गया है? 🧐 इस तस्वीर में कही गई बात आज हमारे देश के कई युवाओं के मन का सवाल है। जहाँ आरक्षण की मूल भावना सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से पिछड़े वर्गों को समाज की मुख्यधारा में लाना था, वहीं अब यह पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होने वाला एक 'अधिकार' बनता जा रहा है।
पहले पिता, फिर बेटा और फिर पोता... यह सिलसिला कब तक चलेगा? क्या हम वास्तव में एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जहाँ योग्यता और प्रतिभा के बजाय जन्म के आधार पर अवसर तय होंगे? एक दलित का बेटा दलित ही रहेगा, यह सोच हमें किस ओर ले जा रही है? क्या हमने वास्तविक समानता के लक्ष्य को कहीं पीछे छोड़ दिया है?
आरक्षण का उद्देश्य था, सभी को समान पायदान पर लाना, न कि एक अनन्त व्यवस्था बनाना। हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि क्या मौजूदा आरक्षण प्रणाली अपने उद्देश्यों को पूरा कर रही है, या यह केवल विभाजन और असंतोष बढ़ा रही है। क्या यह समय नहीं है कि हम आरक्षण के इस 'मुकुट' का पुनर्मूल्यांकन करें और एक ऐसे भारत की कल्पना करें जहाँ हर व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार अवसर मिलें, बिना किसी जातिगत बाधा के?
हम एक ऐसे भारत की कल्पना करते हैं जहाँ 'आरक्षण मुक्त भारत' हो, जहाँ हर नागरिक को उसकी मेहनत और प्रतिभा के आधार पर पहचान मिले। जहाँ किसी को भी अपने जन्म के कारण पीछे न रहना पड़े और न ही किसी को केवल जन्म के कारण असीमित लाभ मिलते रहें।
आप क्या चाहते हैं? क्या आप एक आरक्षण मुक्त भारत चाहते हैं जहाँ योग्यता ही एकमात्र मापदंड हो? अपनी राय कमेंट्स में बताएं! 👇
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