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पैरा पावरलिफ्टिंग खिलाड़ी झंडू कुमार और पैरा एथलेटिक्स खिलाड़ी सोमन राणा का राष्ट्रमंडल खेल 2026 के लिए भारतीय टीम में चयन हुआ है।
अपने उत्कृष्ट प्रदर्शन, अथक मेहनत और खेल के प्रति समर्पण के बल पर दोनों खिलाड़ियों ने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश का मान बढ़ाया है। अब ये दोनों खिलाड़ी विश्व मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करेंगे।
बिहार राज्य खेल प्राधिकरण की ओर से दोनों खिलाड़ियों को हार्दिक बधाई एवं आगामी प्रतियोगिता के लिए शुभकामनाएँ। हमें विश्वास है कि आप अपनी उपलब्धियों से देश और राज्य को गौरवान्वित करते रहेंगे।
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नागालैंड के लोक कला गुरु Sangyusang S. Pongener को कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके अमूल्य योगदान के लिए पद्म श्री सम्मान से सम्मानित किया गया है।
संगयुसांग एस. पोंगेनर ने वर्षों तक नागालैंड की लोक कला, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का काम किया है। उनकी मेहनत की बदौलत कई पारंपरिक कलाएं आज भी जीवित हैं।
पद्म श्री सम्मान मिलने के बाद उनकी कहानी देशभर में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोग इसे उन गुमनाम कलाकारों और सांस्कृतिक कर्मियों के सम्मान के रूप में देख रहे हैं, जो वर्षों से बिना किसी प्रचार-प्रसार के अपनी संस्कृति को बचाने में लगे हुए हैं।
ऐसे सम्मान यह संदेश देते हैं कि देश के दूर-दराज़ इलाकों में रहकर समाज और संस्कृति के लिए काम करने वाले लोगों के योगदान को भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है।
संगयुसांग एस. पोंगेनर की यह उपलब्धि न केवल नागालैंड बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का विषय है। उनकी कहानी यह बताती है कि समर्पण और सेवा कभी अनदेखी नहीं रहती।
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“साहब, मेरे पास दिल्ली आने के पैसे नहीं हैं, कृपया पद्मश्री डाक से भेज दीजिए” - यह बात कहने वाले कोई आम व्यक्ति नहीं, बल्कि ओडिशा के मशहूर लोक कवि हलधर नाग थे। 2016 में साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री पाने वाले हलधर नाग की सादगी ने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया।
सफेद धोती, गमछा, बनियान और नंगे पांव जब वह राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से सम्मान लेने पहुंचे, तो हर आंख ठहर गई। गरीबी, संघर्ष और साधना की यह मिसाल ओडिशा के बरगढ़ जिले से निकली थी। 10 साल की उम्र में माता पिता को खोने के बाद पढ़ाई छूटी, ढाबे में जूठे बर्तन धोए, स्कूल में बावर्ची बने और छोटी सी स्टेशनरी दुकान चलाई।
लेकिन लिखना नहीं छोड़ा। 1990 में पहली कविता छपी और फिर कोसली भाषा में 20 महाकाव्य रचे, जो आज भी उन्हें शब्दशः याद हैं।
यह कहानी बताती है कि सच्ची दौलत शब्दों की शक्ति, स्मृति की साधना और जमीन से जुड़ी रचनात्मकता होती है। हलधर नाग ने साबित किया है कि गरीबी कभी प्रतिभा की सीमा नहीं बनती।
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