सीएम भगवंत मान ने UPSC 2025 के चयनित अभ्यर्थियों को किया सम्मानित
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सीएम भगवंत मान ने UPSC 2025 के चयनित अभ्यर्थियों को किया सम्मानित
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देहरादून में रहने वाला कुकरेती परिवार के एक नहीं बल्कि पाँच-पांच भाइयों ने एक साथ 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में मोर्चा संभाला था. जो शायद भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे दुर्लभ उदाहरणों में से एक है।पाँच भाइयों में से तीन राजपूत रेजिमेंट और दो ईएमई कोर में थे। अलग-अलग मोर्चों पर वीरता दिखाते हुए, उन्होंने भारत की विजय में योगदान दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती, शौर्य चक्र विजेता, उन साहसी सैनिकों में से थे।
ये परिवार देहरादून के डिफेंस कॉलोनी इलाके में रहता है. इन पांच भाईयों में से तीन भाई राजपूत रेजिमेंट में और दो भाई ईएमई कोर में तैनात थे. इन सभी को अलग-अलग मोर्चों पर तैनात किया गया था, उनकी यूनिट अलग थीं लेकिन, सबका संकल्प केवल एक ही था- भारत माता की विजय।
एक परिवार के पांच भाइयों ने संभाला था मोर्चा:
इन पांच वीरों में सबसे प्रमुख नाम है शौर्य चक्र विजेता रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती. वे बताते हैं कि नवंबर 1971 के अंतिम सप्ताह में ही युद्ध की आहट साफ सुनाई देने लगी थी. सीमाओं पर तनाव बढ़ रहा था, पाकिस्तानी सेना भारतीय फौज की सप्लाई लाइनों को तोड़ने की साजिश रच रही थी. लेकिन, भारतीय जवान हर चुनौती के लिए तैयार थे.
युद्ध के दौरान धर्मनगर से गाजीपुर तक दुश्मन के इलाके में घुसकर की गई रेकी ने रणनीति की दिशा बदल दी. लेफ्टिनेंट कर्नल कुकरेती याद करते हैं जब उन्होंने तीन दिन तक बिना खाने और पानी के करीब 93 किलोमीटर तक पैदल चलते रहे. चारों तरफ गोलों की बारिश लेकिन, हौसला जरा भी डगमगाया नहीं. उनकी आंखों में आज भी वह दृश्य जिंदा है, जब मौत बेहद करीब थी लेकिन, देश से बड़ा कुछ भी नहीं था।
कुकरेती परिवार की यह वीरगाथा केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रही. इसे ‘कहानी 1971 युद्ध की’ नामक पुस्तक में सहेजा गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आज़ादी और विजय के पीछे कितनी कुर्बानियां छिपी होती हैं।💐💐🇮🇳🇮🇳
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महाभारत के अंत के बाद…
जब श्री कृष्ण इस धरती से चले गए,
तब सब कुछ बदल गया।
अर्जुन, जो कभी कुरुक्षेत्र में अजेय था,
जिसके गांडीव के सामने महारथी भी टिक नहीं पाए…
वही अर्जुन द्वारिका की यदुवंशी स्त्रियों और बच्चों को
सुरक्षित हस्तिनापुर ले जा रहा था।
लेकिन रास्ते में…
कुछ साधारण लुटेरों ने हमला कर दिया।
अर्जुन ने गांडीव उठाया…
पर इस बार वह पहले जैसा नहीं था।
दिव्य अस्त्र शांत हो चुके थे,
तरकश के बाण भी जैसे साथ छोड़ चुके थे।
और वो महान धनुर्धर…
एक साधारण काबा के सामने हार गया।
क्योंकि इस बार न समय साथ था…
न श्री कृष्ण।
बाद में महर्षि वेद व्यास ने समझाया—
यह सब नियति थी, समय का खेल था…
ताकि अर्जुन समझ सके कि
शक्ति, ज्ञान और विजय भी
समय के आगे कुछ नहीं।
समय सबसे बलवान है।
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