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क्या 160 साल पुराना यह ऐतिहासिक पुल आज की आधुनिक इंजीनियरिंग को भी हैरान कर देता है?
प्रयागराज में यमुना नदी पर बना पुराना नैनी यमुना रेल पुल, जिसे गऊघाट पुल के नाम से भी जाना जाता है, ब्रिटिश दौर की इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। इस पुल का निर्माण 1859 में शुरू हुआ था और 15 अगस्त 1865 को इस पर पहली ट्रेन चली थी। यानी यह पुल 160 साल से भी ज्यादा समय से यमुना के ऊपर खड़ा है।
उस दौर में यमुना को पार करना रेलवे के लिए बड़ी चुनौती थी। पुल बनने से पहले दिल्ली और हावड़ा के बीच रेल संपर्क यमुना के कारण पूरी तरह आसान नहीं था। इसी जरूरत को देखते हुए नैनी और तत्कालीन इलाहाबाद के बीच पुल बनाने की योजना तैयार की गई। करीब छह साल की मेहनत के बाद यह विशाल पुल तैयार हुआ। इसके निर्माण में उस समय 44 लाख 46 हजार 300 रुपये खर्च हुए थे।
पुल की बनावट अपने आप में खास है
यह पुल करीब 3150 फीट लंबा है और इसमें 14 मुख्य पिलर तथा 17 स्पैन हैं। इसके पिलरों की नींव लगभग 42 फीट गहराई तक बताई जाती है। पुल के विशाल गर्डरों का कुल वजन करीब 4300 टन बताया गया है। निर्माण में बड़ी मात्रा में ईंट और गारे का इस्तेमाल हुआ था।
इस पुल के पिलरों में से 13 नंबर पिलर की कहानी भी काफी दिलचस्प है। यमुना के तेज बहाव के कारण इसे बनाने में काफी परेशानी आई थी। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, पानी का स्तर नीचे करने के बाद गहरी नींव तैयार की गई और उसके ऊपर पिलर खड़ा किया गया। इसके विशेष आकार के कारण इसे 'हाथी पांव पिलर' भी कहा जाता है।
रेल से सड़क तक बदला स्वरूप
जब पुल बना था, तब इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से रेलवे के लिए किया जाता था। बाद के वर्षों में इसमें बदलाव किए गए। 1913 में इसे डबल लाइन के लिए परिवर्तित किया गया और 1928-29 में पुराने गर्डरों की जगह नए गर्डर लगाए गए। इसके बाद भी समय-समय पर पुल की संरचना और रेलवे ट्रैक से जुड़े हिस्सों में जरूरी काम होते रहे।
पुल के निचले हिस्से को बाद में सड़क यातायात के लिए भी इस्तेमाल किया जाने लगा, जिससे यह एक तरह का डबल-डेकर पुल बन गया—ऊपर रेलवे और नीचे सड़क यातायात। 2007 में ट्रैक पर लगे पुराने लकड़ी के स्लीपरों की जगह स्टील चैनल स्लीपर लगाए जाने की जानकारी भी मिलती है।
आज भी इतिहास का गवाह
इस पुल की सबसे बड़ी खासियत सिर्फ इसकी उम्र नहीं है, बल्कि यह है कि इतने लंबे समय के बाद भी इसकी मूल संरचना का बड़ा हिस्सा इतिहास की उस इंजीनियरिंग को सामने रखता है। पुल पर समय-समय पर मरम्मत, री-गर्डरिंग और दूसरे रखरखाव के काम किए गए हैं। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, इससे आज भी 200 से अधिक ट्रेनें प्रतिदिन गुजरती हैं।
आज जब आधुनिक तकनीक से बड़े-बड़े पुल कुछ ही वर्षों में तैयार हो जाते हैं, वहीं यमुना के ऊपर खड़ा यह पुराना पुल अपने निर्माण इतिहास, विशाल लोहे के गर्डरों, गहरी नींव और लंबे समय से चले आ रहे रखरखाव के कारण लोगों का ध्यान खींचता है।
यह सिर्फ लोहे और ईंट-पत्थरों से बना पुल नहीं, बल्कि प्रयागराज के इतिहास, रेलवे के विकास और डेढ़ सदी से ज्यादा पुरानी इंजीनियरिंग विरासत की जीवित पहचान है।
70-80 के दशक में शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना ने हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाई। शत्रुघ्न सिन्हा की दमदार आवाज़ और बेबाक अंदाज़ दर्शकों को खूब पसंद आया, तो विनोद खन्ना अपनी शानदार स्क्रीन प्रेजेंस और बहुमुखी अभिनय के लिए जाने गए। दोनों सितारों की अदाकारी ने उस दौर के सिनेमा को खास बनाने में अहम भूमिका निभाई।
जंगल सिर्फ पेड़ों का समूह नहीं होता, यह प्रकृति की पूरी दुनिया होती है!
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में लंबे समय तक हुए कोयला खनन के बाद खनन से प्रभावित जमीन को दोबारा हराभरा करने की कोशिशें की जा रही हैं। प्रशासन की ओर से स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाकर खनन क्षेत्र की जमीन के जैविक पुनर्वास का दावा किया गया है। यह निश्चित रूप से पर्यावरण की दिशा में एक जरूरी कदम है।
लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि जमीन पर दोबारा कितने पेड़ लगाए गए। सवाल यह भी है कि क्या लगाए गए नए पेड़ उस पुराने प्राकृतिक जंगल की पूरी पारिस्थितिकी को वापस ला सकते हैं?
एक प्राकृतिक जंगल को तैयार होने में वर्षों नहीं, बल्कि कई दशकों और कभी-कभी सदियों का समय लगता है। वहां सिर्फ पेड़ नहीं होते, बल्कि मिट्टी की अपनी संरचना, अलग-अलग वनस्पतियां, पक्षी, जंगली जीव, कीड़े-मकौड़े, जलस्रोत और असंख्य जीवों का एक जटिल प्राकृतिक तंत्र होता है।
पुराने जंगलों से स्थानीय समुदायों की आजीविका, परंपराएं और सांस्कृतिक जुड़ाव भी जुड़े होते हैं। इसलिए लाखों नए पौधे लगाना जरूरी और सराहनीय प्रयास हो सकता है, लेकिन इससे मूल प्राकृतिक जंगल की पूरी जैव विविधता तुरंत वापस नहीं आ जाती।
हरियाली वापस आना अच्छी बात है, लेकिन एक बार प्राकृतिक जंगल कट जाए, तो उसे उसी रूप में वापस लाना आसान नहीं होता।
इसलिए खनन के बाद पुनर्वास के साथ-साथ बचे हुए प्राकृतिक जंगलों का संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
पेड़ लगाना जरूरी है… लेकिन जंगल बचाना उससे भी ज्यादा जरूरी है।