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प्रतापगढ़ में पति ने अपने पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करवा दिया।

एक पति के लिए ये पल कितना दुखद रहा होगा जब उसकी पत्नी ही उसका भरोसा तोड़ दे।

एक व्यक्ति अपने पत्नी को उसके प्रेमी के साथ पकड़ लेता है फिर उसने पुलिस को बताया इसके बाद गांव में पंचायत होती हुई लोगो के.

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प्रतापगढ़ में पति ने अपने पत्नी की शादी उसके प्रेमी से करवा दिया।

एक पति के लिए ये पल कितना दुखद रहा होगा जब उसकी पत्नी ही उसका भरोसा तोड़ दे।

एक व्यक्ति अपने पत्नी को उसके प्रेमी के साथ पकड़ लेता है फिर उसने पुलिस को बताया इसके बाद गांव में पंचायत होती हुई लोगो के.

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धर्म चाहे जो भी हो, अच्छे इंसान बनो।

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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आने वाले ध्यान दे — पहली बार नई दिल्ली रेलवे स्टेशन आते हैं तो इन महिलाओं से बचकर रहें! खुलेआम यह महिलाएं आपके साथ Scam कर सकती हैं! #newdelhiscam
कुछ दिन पहले भी मैंने इसको लेकर एक पोस्ट डाली थी! नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर बहुत सारी महिलाओं का ग्रुप खुलेआम लोगों के साथ Scam कर रही हैं! इनका काम कुछ नहीं है बस यह मेट्रो स्टेशन के बाहर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर ग्रुप बनाकर खड़ी होती है और फेक फ्लैग लोगों को चिपकती हैं और उसके बदले जबरदस्ती उनसे पैसे ऐंठती है! दिल्ली पुलिस से मैंने रिक्वेस्ट भी की थी कि इन महिलाओं को रोका जाए! लेकिन अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है अभी भी यह महिलाएं खुलेआम नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर लोगों के साथ Scam कर रही है! आप लोग आते व जाते हुए इन महिलाओं से बचकर रहना! #scam

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इंदौर की घटना ने आत्मा को झकझोर दिया…कभी इस हिंदुस्तान को संस्कृति की शान कहा जाता था पर आज हालात कितने बदल गए
ये सिर्फ एक अपराध नहीं, यह हमारी संवेदनाओं की परीक्षा है।
एक बेटी, जो सपनों के साथ घर से निकली थी…
एक परिवार, जिसने भरोसे के साथ उसे शहर भेजा था…
और एक युवा, जिसने इंसानियत की सारी सीमाएँ लांघ दीं।
नशा केवल शरीर को नहीं, सोच को भी मार देता है।
जब चरित्र कमजोर होता है, तब अपराध जन्म लेता है।
और जब हम चुप रहते हैं, तब अपराधियों का हौसला बढ़ता है।
युवाओं से निवेदन है—
आकर्षण को प्रेम मत समझो।
गुस्से को अधिकार मत समझो।
नशे को आधुनिकता मत समझो।
किसी की “ना” को चुनौती मत समझो।
सच्ची मर्दानगी सुरक्षा में है, सम्मान में है, संयम में है।
और सच्ची आधुनिकता संस्कारों के साथ आगे बढ़ने में है।
माता-पिता अपना सर्वस्व त्यागकर बच्चों को पढ़ने भेजते हैं—
ताकि वे देश का भविष्य बनें, किसी की जिंदगी का अंत नहीं।
आज जरूरत है—
परिवारों में संवाद की
शिक्षा में नैतिकता की
मित्रता में मर्यादा की
समाज में सजगता की
आइए संकल्प लें—
हम अपने शहर, अपने देश को ऐसा नहीं बनने देंगे।
हम अपनी सोच को शुद्ध रखेंगे, दूसरों की गरिमा का सम्मान करेंगे,
और हर बेटी की सुरक्षा को अपना कर्तव्य मानेंगे।
इंदौर की यह घटना केवल खबर नहीं…
यह चेतावनी है।
अब भी समय है—
युवा जागें, समाज जागे, देश जागे। 🇮🇳
#foryoupagereels #facebookphotochallenge #indian #newpostchallenge

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#बाप #गरीब फिर भी #कर्जा लेकर #बेटी को #पढ़ाई करवाता रहा लेकिन बेटी 3 बार #असफल हो गई कारण #आरक्षण फिर लास्ट मे बेटी #भगवान के पास 😰 #मोदीजी आरक्षण ख़त्म करो जो अच्छा #पढ़ेगा मेहनत करेगा वही आगे जाएगा #सिस्टम ऐसा लाओ 😰 ये केसा #न्याय 35 नम्बर वाला पास और #मिडिल_क्लास का आदमी 50 नम्बर लाने के बाद भी फेल

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मैं क्या मांगू..

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जिंदगी का सबसे खूबसूरत ..!👍👍💯💯💯✔️👇👇♥️

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समाज की मजबूती केवल कानूनों से नहीं, बल्कि सोच से आती है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं होता, बल्कि दो परिवारों और आने वाली पीढ़ियों की जिम्मेदारी भी होता है। इसलिए जीवनसाथी का चयन करते समय समझदारी और परिपक्वता आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति अपनी आदतों पर नियंत्रण नहीं रख पाता, तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। उसका असर उसके परिवार और भविष्य की पीढ़ियों पर भी पड़ता है। गलत आदतें केवल वर्तमान को ही नहीं, बल्कि आने वाले कल को भी प्रभावित करती हैं।
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अजीब तमाशा है भाई इस दुनिया का अगर एक गरीब का बच्चा पेट की आग बुझाने के लिए चाय की दुकान पर बर्तन मांझे तो उसे 'बाल अपराध' कह कर पुलिस उठा ले जाती है लेकिन वही बच्चा अगर टीवी सीरियल के सेट पर रात-रात भर मेकअप लगाकर 18-18 घंटे कैमरे के सामने खटे तो उसे दुनिया 'बाल कलाकार' कह कर तालियां बजाती है मतलब ये कौन सा चश्मा है भाई जिससे गरीब और अमीर का बचपन अलग-अलग नजर आता है राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल जी ने जो सवाल उठाया है ना वो सीधा सिस्टम के मुंह पर तमाचा है सोचिए एक मासूम अगर मजबूरी में अपने परिवार की दो वक्त की रोटी के लिए पसीना बहाए तो उसे 'जुर्म' बता दिया जाता है मालिक पर केस होता है बच्चे को रेस्क्यू किया जाता है लेकिन वही मासूमियत जब बड़े-बड़े प्रोड्यूसर्स के लिए करोड़ों का धंधा करती है जब वो बच्चा अपनी पढ़ाई छोड़कर स्टूडियो की लाइटों में झुलसता है तब कानून को उसमें कोई बुराई नजर नहीं आती क्यों क्योंकि वहां पैसा है वहां ग्लैमर है वहां से सरकार को टैक्स मिल रहा है क्या अब बचपन की कीमत भी बैंक बैलेंस से तय होगी क्या कानून सिर्फ उस पर चलेगा जिसकी जेब खाली है अगर बच्चे का काम करना गलत है तो वो हर जगह गलत होना चाहिए चाहे वो ढाबे की कालिख में हो या किसी आलीशान स्टूडियो की चकाचौंध में क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां गरीबी ही सबसे बड़ा गुनाह बन गई है और अमीरी हर गलती को हुनर बना देती है आखिर ये दोहरा मापदंड कब तक चलेगा कब तक हम मासूमों के बचपन को पैसों की तराजू में तोलते रहेंगे दोस्तों क्या आप स्वाति मालीवाल जी की इस बात से सहमत हैं क्या आपको भी लगता है कि हमारे कानून की ये दोहरी सोच गलत है अपनी राय कमेंट में लिखो शर्माओ मत और इस वीडियो को इतना शेयर करो कि ये सवाल हर उस कुर्सी तक पहुँचे जो कानून की अलग-अलग परिभाषा बनाती है बोलो क्या ये सही है या गलत?

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