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स्केट्स पर गतका खेलकर जीता गोल्ड
अमृतसर (पंजाब) के रहने वाले महज 5 साल के नन्हें फतेह सिंह गिल ने अपनी अनोखी प्रतिभा से पूरी दुनिया में देश का नाम रोशन किया है। थाईलैंड के पटाया में आयोजित 'वर्ल्ड मार्शल आर्ट गेम्स 2026' में फतेह ने स्केट्स पहनकर पारंपरिक सिख मार्शल आर्ट 'गतका' का ऐसा हैरतअंगेज प्रदर्शन किया कि जजों से लेकर दर्शक तक दंग रह गए।
इस स्पर्धा में फतेह ने 'गतका ऑन स्केट्स' (Gatka on Skates) कैटेगरी में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल जीता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले और सबसे कम उम्र के खिलाड़ी बने।
महज 2 साल की उम्र से अपने पिता से ट्रेनिंग लेने वाले फतेह इससे पहले लिथुआनिया और सिंगापुर जैसे देशों में भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। उनकी यह अटूट लगन, संतुलन और निडरता आज पूरे देश के युवाओं और बच्चों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है।
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सभी प्रदेशवासियों को उत्तराखण्ड के लोकपर्व "घी संक्रांति" (घ्यू त्यार) की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।
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Coming off a 3–1 win over Wales, the Indian Men’s Team return to Pool D action as they take on England in their second game of the FIH Hockey World Cup Belgium & Netherlands 2026 today! 🇮🇳🏆
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वीरता एवं शौर्य की गायिका: #सुभद्रा_कुमारी_चौहान
‘खूब लड़ी मरदानी वह तो झांसी वाली रानी थी’ कविता की लेखक सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 16 अगस्त, 1904 (नागपंचमी) को प्रयाग (उ.प्र.) के पास ग्राम निहालपुर में ठाकुर रामनाथ सिंह के घर में हुआ था। उन्हें बचपन से ही कविता लिखने का शौक था। प्रसिद्ध लेखिका महादेवी वर्मा प्रयाग में उनकी सहपाठी थीं। दोनों ने ही आगे चलकर खूब प्रसिद्धि प्राप्त की।
15 वर्ष की अवस्था मेें ठाकुर लक्ष्मण सिंह से विवाह के बाद वे जबलपुर आ गयीं। प्रयाग सदा से ही हिन्दी साहित्य का गढ़ तथा कई प्रसिद्ध साहित्यकारों की कर्मभूमि रहा है। जबलपुर भी मध्य भारत की संस्कारधानी कहा जाता है। सुभद्रा जी के व्यक्तित्व में इन दोनों स्थानों की सुगंध दिखाई देती है।
ठाकुर लक्ष्मण सिंह स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय थे। वे कविता भी लिखते थे; पर सुभद्रा जी का काव्य कौशल देखकर उन्होंने कविता लिखना बंद कर दिया। इतना ही नहीं, तो उन्होंने सुभद्रा जी को उच्च शिक्षा प्राप्त करने और सार्वजनिक जीवन में आने को प्रेरित किया। उन दिनों महिलाएं प्रायः पर्दा करती थीं; पर पति से प्रोत्साहन पाकर सुभद्रा जी ने इसे छोड़ दिया।