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आज भाजपा कार्यालय कमलम, चंडीगढ़ में बड़े हर्षोल्लास और पारंपरिक तरीके से सब ने साथ मिलकर लोहड़ी मनाई। अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर सभी ने सुख-समृद्धि, आपसी भाईचारे और देश की खुशहाली की कामना की। लोहड़ी का यह पावन पर्व हमारी संस्कृति, एकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस अवसर पर सभी ने नई ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ने का संदेश लिया।
#लोहड़ी #lohricelebration #भाजपा #bjp #कमलम #चंडीगढ़ #kamalamchandigarh

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आज भाजपा कार्यालय कमलम, चंडीगढ़ में बड़े हर्षोल्लास और पारंपरिक तरीके से सब ने साथ मिलकर लोहड़ी मनाई। अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर सभी ने सुख-समृद्धि, आपसी भाईचारे और देश की खुशहाली की कामना की। लोहड़ी का यह पावन पर्व हमारी संस्कृति, एकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस अवसर पर सभी ने नई ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ने का संदेश लिया।
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आज भाजपा कार्यालय कमलम, चंडीगढ़ में बड़े हर्षोल्लास और पारंपरिक तरीके से सब ने साथ मिलकर लोहड़ी मनाई। अग्नि के चारों ओर एकत्र होकर सभी ने सुख-समृद्धि, आपसी भाईचारे और देश की खुशहाली की कामना की। लोहड़ी का यह पावन पर्व हमारी संस्कृति, एकता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इस अवसर पर सभी ने नई ऊर्जा और संकल्प के साथ आगे बढ़ने का संदेश लिया।
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स्वर्णनगरी लंका अपने वैभव के चरम पर थी, जहाँ की दीवारें सोने की और खंभे मणियों के थे। उसी चमक-दमक के बीच महारानी मंदोदरी निवास करती थीं। वे केवल एक सुंदरी नहीं थीं; उन्हें शक्ति का नहीं, अपितु प्रज्ञा और विवेक का वरदान प्राप्त था। एक उच्च कुल में जन्मी और संयम व करुणा के संस्कारों में पली-बढ़ी मंदोदरी का विवाह उस महाप्रतापी दशानन से हुआ था, जिसका तेज सूर्य के समान था, परंतु जो भीतर ही भीतर अपने अहंकार की अग्नि में जल रहा था। वह लंका की रानी अपनी इच्छा से नहीं, अपितु भाग्य के खेल से बनी थीं।

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बर्बरीक दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर थे। बर्बरीक के लिए तीन बाण ही काफी थे जिसके बल पर वे कौरवों और पांडवों की पूरी सेना को समाप्त कर सकते थे। युद्ध के मैदान में भीम पौत्र बर्बरीक दोनों खेमों के मध्य बिन्दु एक पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हो गए और यह घोषणा कर डाली कि मैं उस पक्ष की तरफ से लडूंगा जो हार रहा होगा। बर्बरीक की इस घोषणा से कृष्ण चिंतित हो गए।

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" जब हनुमान ने सभा के बीच अपना हृदय चीर दिया
भक्ति का वह क्षण, जिसने अयोध्या को रुला दिया "
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अयोध्या की एक सभा उस क्षण इतिहास बन गई, जब भक्ति ने शब्दों से नहीं, हृदय से उत्तर दिया। देवी सीता द्वारा अर्पित हार से उठा एक साधारण-सा प्रश्न, पवनपुत्र हनुमान की भक्ति के माध्यम से परम सत्य में बदल गया। वह दृश्य केवल एक पौराणिक प्रसंग नहीं था, बल्कि यह संदेश था कि जहाँ प्रेम निष्काम हो और सेवा निरहंकार, वहीं सच्ची भक्ति निवास करती है।

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